अपर्णा शर्मा– मकरसंक्रांति – साप्ताहिक प्रतियोगिता

मकर संक्रांति का त्यौहार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है ।सूर्य के उत्तरायण होने पर बनाया जाता है। इस पर्व की विशेषता यह है कि अन्य त्योहारों की तरह अलग-अलग तारीखों पर नहीं आता है। यह हर साल 14 जनवरी को ही मनाया जाता है , जब सूर्य उत्तरायण होकर मकर रेखा से गुजरता है। इसलिए यह त्यौहार मनाया जाता है।
मकरसंक्रांति का त्यौहार का संबंध सीधी पृथ्वी के भूगोल और सूर्य की स्थिति से है जब सूर्य मकर रेखा पर आता है, वो दिन 14 जनवरी होता है। इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ कर मकर राशि में प्रवेश करता है और सूर्य के उत्तरायण की गति कम हो जाती है। यह अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके से बनाया जाता है। आंध्रप्रदेश, केरल और कर्नाटक में इसे संक्राति कहा जाता है। तमिलनाडु में पोंगल पर्व के रूप में बनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत किया जाता है, लोहड़ी पर्व बनाया जाता है। असम में बिहू के रूप में इस पर्व को उल्लास के साथ मनाया जाता है।
इसके नाम अलग-अलग हैं और तरीका भी अलग-अलग है अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार पकवान भी अलग-अलग होते हैं लेकिन दाल और चावल की खिचड़ी इसकी विशेष पहचान है और गुड और घी के साथ खिचड़ी खाने का महत्व है। इसके अलावा तिल और गुड़ का भी मकर सक्रांति पर महत्व है। इस दिन सुबह जल्दी उबटन स्नान किया जाता है और दाल चूरमा बाटी का विशेष महत्व है। सुहागन महिलाएँ पति की आयु लंबी हो इसके लिए दान करती हैं।
मकर सक्रांति को स्नान और दान का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन तीर्थों पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। साथही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल एवं राशि के अनुसार दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है और सूर्य देवता भी प्रसन्न होते हैं। इस दिन गुजरात में पतंग उड़ाने का विशेष महत्व है और लोग बहुत आनंद उल्लास के साथ पतंगबाजी करते हैं तिल और गुड़ की पट्टी का विशेष महत्व है। तिल और गुड़ और गन्ना भी खाते हैं। कई स्थानों पर पतंगबाज़ी पर बड़े-बड़े आयोजन भी की कई स्थानों पर बड़े बड़े आयोजन भी किए जाते हैं।
महाभारत में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर माघ शुक्ल अष्टमी के दिन स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य के उत्तरायण गति में हुआ था। फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अघर्य है एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।
सभी मान्यताओं के अलावा मकर सक्रांति पर्व एक उत्साह से भी जुड़ा है।
शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध , तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुनः प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि शलोक से स्पष्ट होता है- माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥
मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान एवं गंगा तट पर दान को अत्यंत शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग ऐप गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है। सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किंतु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक है। यह प्रवेश अथा संक्रमण के लिए छः-छः माह के अंतराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहां पर राते बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। सूर्य उतरी गुलाध्रर्द की ओर आना शुरू हो जाता है तब इस दिन रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं और गर्म मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटे होने से अंधकार कम होगा।
मकर सक्रांति पर सूर्य राशि में परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतना एवं कार्य में वृद्धि होती है। संपूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना, पूजन कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। सामान्यतः भारतीय पंचांग पद्धति की समस्या तिथियाँ चंद्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं।
मकर संक्रांति का ऐतिहासिक महत्व- ऐसी मान्यता है इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकरसंक्रांति का चयन किया था। मकर सक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थी। इसलिए मकर संक्रांति का त्यौहार बनाया जाता है।