दीपक अनंत राव – मकरसंक्रांति – साप्ताहिक प्रतियोगिता

आज जो होता रहता है
आज जो बोला करता है၊
कुछ करके ज़माने के लफ्जों में छिप जाते है,
वह इतिहास कहलाता है၊
संस्कृति की संज्ञा बन जाती है।
लोहड़ी भी एक सुंदर संस्कृति है,
भारत की परंपरा है၊
प्रकृति एवं पुरुष की अनोखे बन्धन की कड़ी၊
यह तो जीने की एक कला भी है,
कई जमाने से पर्व के रंगों से
खूब सजाकर शोभा निहारने वाली
जनवरी की यह राणी,
मकर संक्रान्ति सा श्रृंगार भाव ॥
पतझरों में बसंत में सावन में,
जब इनज़ान के दिलों पर
यह आकर छा जाता है,
तो चारों ओर शोभा निराली၊
गंगा मैय्या भी अपने
पुत्रों को देखकर खिलखिल उढती,
महादेव की उपासना में भारत वर्ष मग्न,
सूर्य देव से समाज की आभारी၊
यहाँ आदमी हर प्रकार अपना
आस्तित्व खोजता है,
लोहडी का यही हाजियत है၊
मकर संक्रान्ति की यही विशेषता၊
थडकते दिलों से,
भरते सपनों से,
अन्न अन्न में ईश्वर खोजते,
उसके मन में
यहाँ इस पवित्र धरती पर,
जीवन्त रहने की भावना बरकरार रखते၊
सुन्दर सृष्टि का परिचायक बनते၊
उसी से वह,
भाईचारा बुनते. यारी पिरोते,
धर्म,जाती,देश,भाषा,सभी के
परे बसुदैव कुटुम्बम खोजते,
इंनज़ानियत का पाठ सिखाते,
लोहडी का यही भाव है၊
एक साथ रहने का अहमियत ।
हर लोहडी हरी भरी संस्कृति की यादगार ॥