इकरारनामा

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      हां मैं कबूलती हूं

अपना हर अपराध

नज़र से नज़र मिलाना चाहती हूं

उन सदाचारियों और नेक दिल इन्सानों से

जो दर्ज करा आए हैं मेरा अपराध

हां, मैंने की अति व्यस्ततम लोगों के

चेहरे पढ़ने की कोशिश

अपने-अपनों की कतराती आंखों में

झांकने का साहस

उठाए मैंने मां-बाप,

गुरुमीत के आदर्शों की जिम्मेदारी

इन सबको निभाते-निभाते

अपने ही खिलाफ हो चुकी हूं

आखिर वे ही मुंसिफ हैं इस अदालत के

जिन्होंने चाहा,

इस कोशिश, साहस और जिम्मेदारी की हत्या हो जाए

भगवान तुम्हें तरस खाने की ज़रूरत नहीं

मुझे तुमसे अधिक फ्रिक है

दुनिया को बेदाग रखने की

Dr. SUDHA UPADHYAYA


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