‘इच्छा मृत्यु’ पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आज सुनाएगी फैसला

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इच्छा मृत्यु (लिविंग विल) के मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ आज अपना फैसला सुनाएगी। इसमें मरणासन्न व्यक्ति की ओर से उसकी इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को मान्यता देने की मांग की गई है। ‘लिविंग विल’ एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से ये निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में उसके पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की हालत में उसे किस तरह का इलाज दिया जाए।

‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छा मृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति की मौत की तरफ बढ़ाने की मंशा से उसे इलाज देना बंद कर दिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 11 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अंतिम सुनवाई में केंद्र ने इच्छा मृत्यु का हक़ देने का विरोध करते हुए इसके दुरुपयोग होने की आशंका जताई थी। पिछली सुनवाई में संविधान पीठ ने कहा था कि ‘राइट टू लाइफ’ में गरिमापूर्ण जीवन के साथ-साथ गरिमामय ढंग से मृत्यु का अधिकार भी शामिल है’ ऐसा हम नहीं कहेंगे। हालांकि पीठ ने आगे कहा कि हम ये जरूर कहेंगे कि गरिमापूर्ण मृत्यु पीड़ा रहित होनी चाहिए।

इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने कहा था कि इच्छा मृत्यु पर अभी सरकार सारे पहलुओं पर गौर कर रही है और इस मामले में आम जनता और इस क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक संगठनों से सुझाव भी मांगे गए हैं। हालांकि केंद्र ने इच्छा मृत्यु यानी लिविंग विल का विरोध किया है। बता दें कि एक एनजीओ ने लिविंग विल का अधिकार देने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उसने सम्मान से मृत्यु को भी व्यक्ति का अधिकार बताया था।

क्या है लिविंग विल
– लिविंग विल में कोई भी व्यक्ति जीवित रहते वसीयत कर सकता है कि लाइलाज बीमारी से ग्रस्त होकर मृत्यु शैय्या पर पहुंचने पर शरीर को जीवन रक्षक उपकरणों पर न रखा जाए।

– केंद्र ने कहा अगर कोई लिविंग विल करता भी है तो भी मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर ही जीवन रक्षक उपकरण हटाए जाएंगे।

पैसिव यूथनेशिया का समर्थन 
एनजीओ कॉमन कॉज ने 2005 में इस मसले पर याचिका दाखिल की थी। कॉमन कॉज के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को ‘लिविंग विल’ बनाने का हक होना चाहिए। ‘लिविंग विल’ के माध्यम से शख्स यह बता सकेगा कि जब वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए, जहां उसके ठीक होने की उम्मीद न हो, तब उसे जबरन लाइफ सपॉर्ट सिस्टम पर न रखा जाए।


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