इस जुनून को कब मिलेगा मुकाम

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वह जुनूनी है, दीवाना है या यूं कह लें कि वह पागल है। अपने शौक की खातिर वह किसी हद तक जाने को आमादा रहता है। उसके दीवानेपन की इंतेहा ही है कि उसने वह कर दिखाया है जो शायद आम इंसान के बस की बात नहीं। सौ से ज्यादा औरंगजेब बादशाह से महारानी विक्टोरिया तक के फारसी फरमान, दस्तावेज, पत्र, इस्ट इण्डिया कम्पनी के दो से बारह फिट लम्बे दर्जनों दस्तावेज, नक्काशीदार दपर्ण, रूपये एक से एक हजार के 786 अंक सीरीज वाले भारतीय व विदेशी नोट, देशी व विदेशी सैकड़ों डाक टिकट व करेंसी नोट, ईसा पूर्व और मुगलकाल, ब्रितानी हुकूमत, राजशाही से लगायत अब तक के सैकड़ों दुर्लभ सिक्के, प्राचीन दौर के मिट्टी के ऐतिहासिक पुरातात्विक महत्व के पात्रावशेष, खिलौने, बर्तन, घड़ा, मनका, हुक्के की चीलम इत्यादी उसके अपने शौक व जुनून के संग्रह की शान हैं।
इस तरह की चीजों को संग्रहित किया है उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के दिलदार नगर के रहने वाले युवा संग्रहकर्ता कुंवर नसीम रजा ने। इनके पास तीन हजार साल के कुषाण कालीन समय के बर्तन और अन्य दुर्लभ वस्तुएं मुगलकालीन सिक्कों सहित अन्य दुलर्भ चीजें मौजूद हैं। नसीम राजा कहते हैं कि उन्हें यह शौक पुश्तैनी विरासतमें मिला है। पीढि़यों की यह परम्परा यहीं खत्म नहीं होती बल्कि बचपन से ही एैतिहासिक चीजों के बारे में खास रूचि रखने वाले नसीम ने इस संग्रह में तमाम देशों की करेंसी नोटों, डाक टिकटों, 786 लिखि वस्तुओ के तकरीबन 300 आइटम, मौर्य काल से अब तक के ईंटों की संग्रह, स्थानयी स्तर पर प्रचलित हस्तकला निर्मित सैकडों सुजनी व सौ साल तक के शादी कार्ड को शामिल कर दिया है।
दौर आता है और गुजर जाता है। अगर कुछ बचता है तो वह पाण्डुलिपियां, दस्तावेज व फररमान, जिन अभिलेखों के जरिये लोगों को अपनी बातों व धारणओं को सच साबित करने का मौका मिलता है। जिसे सहेजने व सम्हालने का काम किया है नसीम रजा ने। अपने फारसी फरमानों व दस्तावेजों के बार में नसीम रजा बताते हैं कि ‘‘उनके पास जो हिन्दी पाण्डुलिपियां हैं उससे ज्ञात होता है कि इस्लाम धर्म में दाखिल होने से पहले दीनदार खां जिनके नाम पर दिलदार नगर का नाम पड़ा है, का नाम कुवंर नवल सिंह पुत्र कुंवर लक्षराम सिंह पुत्र कुंवर खर सिंह था जो कि सकरवार राजपूत थें तथा मौजा समहुता परगना चैनपुर, बिहार के जमींदार थे। ’’  वैसे तो इनके पास सौ से ज्यादा फारसी व अन्य फरमान/दस्तावेज हैं मगर दो फरमान भारतीय मुगल इतिहास में एक आयाम व अध्याय पैदा करेंगे। एक सुनहरे कागज व एक चांदी के कागज पर अंकित है। नसीम कहते हैं कि ‘‘ चांदी पर अंकित फरमान का जब अनुवाद करवाया तो पता चला कि आबिद खां मोरीद बादशाह आलमगीर 1078 हिजरी के मोहर से प्रमाणित फरमान में मुहम्मद दीनदार खां के भाई हाजी ख्वाजा मियां दानिश को जो किसी सरदार के पुत्र हैं और असल हैं इसलिए मियां दानिश को बादशाह औरंगजेब ने अपना फरजंद दत्तक पुत्र कुबूल किया। बादशाह औरंगजेब ने यह तहरीर 1085 हिजरी में लाहौर के दारूल सल्तनत से जारी किया। जबकि सुनहरे कागज पर अंकित फरमान के मुताबिक 1076 बीघा बारह बिस्वा जमीन अपनी निजी मिल्कियत से दानिश को देने का जिक्र मिलता है। वहीं अन्य दस्तावेजों से पता चलता है कि परगना जमानियां एवं परगना चैनपुर से 12 लाख से 80 लाख रूपये लगान के रूप में अदा किया जाता था जो उस दौर के मिल्कियत की अनोखी पहचान है। ’’  इनके फरमानों में गोदनामा, परवाना राहेदारी, लगान माफी, महजरनामा, एकरारनामा, इजाजतनामा, किस्मतनामा, कबाला, फैसलनामा, हिस्सानामा और मद्द-ए-मास के दस्तावेज मौजूद हैं।
इनके संग्रहालय में मुगलकालीन दौर के चांदी, तांबा व बुतवलिया सिक्के, किनवार स्टेट, राजा ग्वालियर, नवाब हैदराबाद, नवाब अवध के दौर के सिक्के, ब्रिटिश काल के महारानी विक्टोरिया, जार्ज-5, जार्ज-6 एवं एडवर्ड के सिक्के, स्वतंत्र भारत के एक आना से लेकर रूपये सौ तक के सिक्के, तांबा के छेद वाले सिक्के, आहत सिक्कों सहित तीस विदेशी मुल्कों के हजारों सिक्के मौजूद हैं। बात अगर करेंसी नोटों की करें तो इनके पास भारत के सभी गवर्नरों के हस्ताक्षर वाले नोट, महात्मा गांधी का हुण्डी नोट, एक रूपये एक हजार तक के 786 अंक वाले सैकड़ों नोट, दर्जनों विदेशी मुल्कों के नोट जिसमें प्लास्टिक के भी नोट शामिल हैं। इसके अलावा इनके पास 2500 किताबों की एक लाइब्रेरी भी है, जिसमें विधि विषयों पर हिन्दी, अंगेजी, उर्दू, अरबी की पुस्तके मौजूद हैं।
इन्होने 786 अंक के 786 आइटम कलेक्ट करने का भी संकल्प लिया है, जिसमें अब तक तकरीबन 300 आइटम संग्रहित करने में कामयाब भी रहे हैं। जिसमें प्रमुख रूप से एक से एक हजार तक के नोट, 786 दाने की तस्वीह, 786 का माला, 786 के मुहर, तावीज, लाकेट, ख्वाजा के 786 वें उर्स का कैसेट इत्यादी है। साथ ही हस्तकला की अनूठी पहचान हस्त निर्मित सैकड़ों सुजनी का भी संग्रह किया है। मौर्य काल से अब तक के ईंट भी इनके संग्रह की पहचान हैं। जिसमें प्रमुख रूप से बीसवीं शताब्दी के सन वाईज ईंट मौजूद हैं।
नसीम रजा के संग्रह में पुरातात्विक महत्व के चीजों में मौर्य कालीन लोटा, गुप्तकालीन मृद भाण्ड, प्राचीन मिट्टी के लाल, भूरा, काले रंग के पात्रावशेष, मिट्टी के खिलौने, बर्तन, घड़ा, मनके, डैबर, दीप, चीलम व 1200 साल पुरानी संगमरमर की कलात्मक चुडि़यां मौजूद हैं। नसीम बताते है कि ‘‘ उनके संग्राहलय में मौजूद महाराजा नल-दमयंती के टीले से प्राप्त कुषाणेत्तर युग का एक दुर्लभ मानव मृण्मूर्ति शीर्ष भी है। जब मैंने इसे पुरातत्व विभाग,लखनउ के सहायक पुरातत्व अधिकारी गिरीश सिंह को दिखाया तो उन्होने बताया कि यह हस्त निर्मित मृण्मूर्ति नारी की है। इसकी लम्बाई 9 सेमी तथा चैड़ाई 6.5 सेमी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह तीसरी सदी ई0 का है। ’’
नसीम रजा बताते है कि संग्रहालय में मौजूद कुछ चीजें उनके पूर्वजों ने सहेजी थी और कई को उन्होने खुद इकठ्ठा किया है। इसको लेकर ये इतने जुनूनी है कि अपने जरूरी खर्च में कटौती कर अपने संग्रह को समृद्ध करने में जुटे हैं। इनके इसी जज्बे को देखकर उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार, लखनउ की निदेशिका रेखा त्रिवेदी ने 29 जनवरी 2005 में इनको फरमान व दस्तावेज के संदर्भ में प्रशंसा पत्र दिया था। इनके द्वारा अभिलेखागार को दिए गये दस्तावेजों में 50 से ज्यादा मुगलिया फरमान और दस्तावेजात, पत्रों तथा दीनदार खां की पीढि़यों के चित्र षामिल हैं। इस सबके बावजूद सरकारी मद्द के नाम पर इनको कुछ भी हासिल नहीं हुआ। जबकि इन्होने इसके लिए बाकायदा प्रयास भी किया। नसीम बताते हैं कि इन्होने दिसंबर 2004 में पुरातत्व विभाग, अभिलेखागार व संस्कृति मंत्रालय, उत्तर प्रदेष को तत्कालीन मंत्री ओमप्रकाश सिंह के जरिये मद्द के लिए पत्र लिखा मगर नतीजा सिफर रहा। उसके बाद सितंबर 2009 में 39 पन्ने का पत्र स्वयं मिलकर महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली को दिया। इसमें भी कार्यवाही के नाम पर कुछ हासिल नहीं हुआ।
इस दौर में जहां महत्वपूर्ण  इतिहास व दस्तावेजात समाप्त हो रहे हैं वहीं नसीम रजा ने बुनियादी और अनोखे दस्तावेजों को संरक्षित कर अलग कार्य किया है। हलांकि नसीम को इस बात की हमेशा कसक रहता है कि आर्थिक दिक्कों की वजह से वो इसे संग्रहालय का रूप नहीं दे पा रहे हैं। सरकार को भी इन फरमानों/दस्तावेजों व अन्य चीजों के संरक्षण का इंतजाम करना चाहिए। ताकि इनका यह प्रयास बेकार न जाये।

एम. अफसर खां सागर