ऋचा अग्रवाल – बेरोजगारी – साप्ताहिक प्रतियोगिता

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आज मैं बहुत खुश  हूँ  क्योंकि आज मेरे बेटे को रोजगार मिल गया।  मुझे आज भी याद हैं मेरे
पास कोई स्थायी काम नहीं था। काम के लिए दर – दर भटकता था। मेरा बेटा पढ़ने-लिखने में
होशियार था इसलिए हमने उसकी पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरी पत्नी लोगों के घर
जाकर  काम करती थी। लोग कहते थे ,“क्या तुम लोग दिनभर मेहनत करते हो आखिर चिराग
को इतना पढ़ा -लिखा कर क्या कर लोगे। हम लोगों की बात को नज़र अंदाज करते थे। मैं
अपनी पत्नी से कहता था कि, ” हमारी पूँजी तो हमारा बेटा है, हमारा रोज़गार हमारा बेटा ही  है।”
 
                 एक दिन मुझे कहीं  काम नहीं मिल रहा था। सुधा की भी तबियत ठीक न होने के
कारण  काम पर नहीं जा पा रही थी। आगे की पढ़ाई के लिए  फीस देने के लिए हमारे पास पैसे
नहीं।  बेचैनी बढ़ती जा रही थी।  बेटे को  छात्रवृत्ति मिल गई। मेरी पत्नी ने मुझे झकझोरा मेरी
तंद्रा टूटी।
             
बेटे को काम के लिए कनाडा जाना था। वह चला गया। थोड़े दिन तो उसका फ़ोन
आता रहा और पैसे भेजता रहा अचानक से  वो भी बंद हो गया। इधर मेरी पत्नी की हालात
बिगड़ती जा रही है पर करे भी तो क्या करे मैं बेरोजगार ठहरा। अगली सुबह मेरी पत्नी ने
आखिरी साँस ली और मैं उसके पास बैठा शोक मनाते हुए सोच रहा था कि आज मेरे बेटे ने
मुझे बेरोज़गार बना दिया।


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