एक बार दुश्मन को दोस्त बनाके देखते हैं – रशीद अकेला

 

“एक बार दुश्मन को दोस्त बनाके देखते हैं।

नीम के पत्ते चबाके
देखते हैं।
चलो एक बार दुश्मन को दोस्त बनाके देखते हैं।!!1!!
नाउम्मीदी में उम्मीद का द्वीप जलाके
देखते हैं।
दुश्मन को एक बार गले लगाके
देखते हैं।
और पीठ पे खंजर खा लिए बहुत
सामने से एक बार खंजर थमाके
देखते हैं।
चलो एक बार दुश्मन को दोस्त बनाके
देखते हैं। !!2!!
कहता है, कृष्ण-सुदामा सी दोस्ती
है अपनी।
एक बार आजमाके
देखते हैं।
घिरा है, दुश्मनों के बीच अभी वो
एक बार फिर दोस्ती का फर्ज़ निभाके
देखते हैं।
चलो एक बार दुश्मन को दोस्त बनाके
देखते हैं। !!3!!
पुराने ज़ख्मों को याद करके
सोचते हैं।
ज़हर का प्याला पीके जीने की
सोचते हैं।
दिया है, जय-वीरू की दोस्ती का वास्ता उसने
उसकी ख़ातिर सीने पे गोली भी खाके
देखते हैं।
चलो एक बार दुश्मन को दोस्त बनाके
देखते हैं। !!4!!
अहम और वहम में डूबा है, अभी भी वो।
हमही शीश झुकाके
देखते हैं।
सच्चा दोस्त मिलना आसान नहीं इस ज़माने में।
मगर एक प्रयास और करके
देखते हैं।
चलो एक बार दुश्मन को दोस्त बनाके
देखते हैं। !!5!!
!!रशीद अकेला!!
झारखण्ड