कातिल तेरी यादें – दीपक अनंत राव”अंशुमान”

आ गया है वालेंटाइन,
जब इश्क़ मोहब्बत की बातें सभी करते हैं,
पर बात अगर आजमाइश की आ जाए तो सभी डरते है।
मगर हमारी ज़िन्दगी से मोहब्बत कुछ इस कदर हुआ है खफा,ऐसा मेरा भी एक दिन था।
दिन रात और साथ हमारी मोहबतें၊ आज वो मेरे साथ नहीं सिर्फ यादें बाकी।आसमान के तारों के बीच आज भी मैं ने तुम्हें ढूँढा।
ये रातें हमेशा हमारी मुलाकातों की गवाह थी। टिम टिमाते तारों को देखना तुम्हारी आदत थी၊ तब मैं तुम्हारी गोदी से सटकर आसमान को देखता था। हमारे पूर्वजों की नजरें है, आकाश में चमकने वाले ये लाखों सितारे, कभी कभी तू मुझसे कहती भी थी।
कई रातों में तुम्हारी गोदी में लेट कर आसमान को साँवारना मेरा भी आदत हो गया था।
दुनिया को अपनी जादूई झडि से प्रभावित दूर चमकनेवाले सितारों का नूर मेरी मेहबूबा की चमकीली आखों में थी। लहराते पवन उनकी सुंदर लटों को मेरे चेहरे पर डालती और वे लटें मेरे चेहरे पर आहिस्ता टटोलते၊
उसके जिस्म का गंध मुझे गुलाब से भी बहुत प्यारा था। कभी कभी एक दूसरे सटकर उस पहाड की पगडंडी से चलते।
हर पल आखों आखों बात होती।
कभी माथे चूँमकर मैं उसको खिलाती, शरमिली होकर हँसती। बीच बीच हल्के हिलोरे जैसी बातें दोनों का प्यार भरा दिल आपसी गहराइयों तक छूता।
हाथो हाथ में जिन्दगी का लहर।मेरे बगैर जीना तुझे संभव नहीं था।
एक बार तू मुझसे कहा भी था। इसलिए साथ निभाने का वादा लिया,और अब इस
‘वालन्टेंस डे’ में पहले जैसे मैं अकेला गुमसुम बैठा हूँ। शायद खुदा तुझसे ज्यादा प्यार करते होंगे इसलिए खींचके ले गया।
अब सिर्फ सूनापन ही बाकी है जिन्दगी में और तुम्हारे यादों में मरते जी रहा हूँ॥