कोलकाता के बाद बंगाल के सिलिगुड़ी में गिरा नदी पर बना पुल, 3 दिन में दूसरा हादसा

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए भारत में दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंध को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली 5 जजों वाली संवैधानिक पीठ ने समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने को मना कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को मनमाना करार देते हुए व्यक्तिगत चुनाव को सम्मान देने की बात कही.

देश की सर्वोच्च अदालत ने इस केस की गंभीरता देखते हुए 495 पेजों में अपना फैसला सुनाया. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की पीठ ने अलग से फैसला लिया जबकि जस्टिस एएम खानविलकर ने दीपक मिश्रा के फैसले से खुद को जोड़ा.

खास बात यह रही कि इस ऐतिहासिक फैसले के लिए जजों ने काफी ज्यादा होमवर्क किया था. फैसले में दुनियाभर की चर्चित कविता-कहानियों का जिक्र था, जिनमें शेक्सपियर से लेकर मंडेला तक शामिल थे. फैसले में नाटकों, गीतकारों, चितंकों और पूर्व के जजों के बयानों का भी हवाला दिया गया.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने फैसले के दौरान जर्मन विचारक जॉन वुल्फगांग गेटे को कोट करते हुए कहा, ‘मैं जैसा हूं मुझे उसी तरह स्वीकार करो’. इसके अवावा चीफ जस्टिस ने जर्मन दार्शनकि आर्थर शोपेनहॉवर के व्यक्तिवाद के सिद्धांत को भी अपने फैसले में रेखांकित करते हुए कहा, ‘कोई भी अपने व्यक्तिवाद से पीछा नहीं छुड़ा सकता’.


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