गहनतम भावाभिव्यक्ति है :`रेत का समंदर ‘ -डा. नीरज भारद्वाज

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कविता कवि के अंतर्मन की अनुभूति होती है |काव्य में कवि भाव में नहीं बहते दिखते ,बल्कि अपने मन के राग-विराग या सौन्दर्य को शब्दों के माध्यम से कागज़ पर उकेरते नज़र आते हैं| काव्य संग्रह कवि के आत्ममंथन का संग्रह होता है जिसे उसने देखा, भोगा या फिर सुना है | काव्य में शब्दों का गुम्फन ही कवि के लेखन में चार चांद लगा देता है और उसके द्वारा कही गई बात सीधे श्रोता या पाठक तक पहूँच जाती है| शब्दों का सटीक प्रयोग करना एक कला है और उसके लिए कवि स्वतंत्र भी होता है |कबीरदास ने कहा है `भाषा को क्या देखना भाव चाहिए साँच ‘| कवि की व्यापक सोच और उसके व्यापक शब्द भंडार से ही काव्य संग्रह का जन्म होता है | महाकवि जयशंकर प्रसाद ने भी कहा है -`कविता करना अनंत पुण्यों का फल है ‘| इस परिप्रेक्ष्य में `रेत का समंदर’ डा. रमा द्विवेदी द्वारा रचित ऐसा ही काव्य -संग्रह है ,जिसमें कवयित्री ने अपने अंतर्मन के भावों और उद्गारों को उद्घाटित करके लिखा है | इसमें मानव जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है ,जिसकी तरफ कोई बिरला कवि ही हाथ बढ़ाता है| डा. रमा द्विवेदी आशावादी कवयित्री होने के नाते पूरे काव्य संग्रह में कही भी हताशा से भरी बातें कहती नहीं दिखतीं हैं | काव्य- संग्रह में प्रेम और विरह की कहीं -कहीं अनुभूति अवश्य है लेकिन उसका इतना प्रभाव नहीं है कि कवयित्री को विरह की वेणी माना जा सके | `रेत का समंदर’ काव्य संग्रह के विषय में कबीरदास की ये पंक्तिया -`सार-सार को गहि रहे थोथा देई उडाय ‘ सटीक बैठती नज़र आती हैं |

डा. रमा द्विवेदी `रेत का समंदर’ काव्य संग्रह में आधुनिक समाज में माया से लिप्त मनुष्य की दशा और दिशा दोनों को प्राचीन सन्दर्भो को सामने रखकर स्पष्ट किया है | यह सत्य है कि मृत्यु का आना स्वाभाविक है और व्यक्ति को हर पल इसे याद रखना चाहिए लेकिन माया के वश में व्यक्ति वह कर जाता है ,जो उसे नहीं करना चाहिए | `माया श्रंखला –१ कविता में इन्होंने लिखा है -`माया के माया महल में / सत्य भी छुप जाते हैं /दुर्योधन की एक फिसलन / कुरुक्षेत्र भी रच जाते हैं| इस प्रकार यह कहें कि माया और मृत्यु विषयों पर इन्होंने गहराई से लिखा है तो कोई गलत न होगा |
`रेत का समंदर ‘ काव्य संग्रह में डा. रमा द्विवेदी ने मानव जीवन के दोनों पक्षों सुख और दुःख का संतुलित वर्णन किया है | जहां मानव सुख में मगन हो सब कुछ भूल जाता है ,वहीं मानव दुःख में विचलित जल्दी हो जाता है और अपना आपा खो बैठता है | मानव जीवन को चलाने वाले यह सुख और दुःख रूपी दोनों पक्ष मानव जीवन के विकास का कटु सत्य कहते दिखाई देते हैं | `हर गम को पचा लेते हैं, कविता की ये पंक्तियाँ `मेरी जो नाव है पतवार उसमें है ही नहीं / डूब जाने पे हमें खुद ही बचा लेते हैं ‘| यह एक भरोसे और आशा का प्रतीक दिखाई देती है |
कवि प्रकृति से कैसे दूर रह सकता है ? सही मायनों में तो प्रकृति इनकी सहचर होती है| बदलता ऋतुचक्र कवि या कवयित्री के मस्तिष्क में भी विचारों को बदलता दिखाई पड़ता है |गर्मी में जहां व्यक्ति के मन में आग लगती दिखाई देती है अर्थात वह असहनीय लगती है ,तो कवयित्री के भाव भी वैसे ही दिखाई पड़ते हैं | डा. रमा द्विवेदी भी ऋतुचक्र के साथ भाव बदलती दिखाई पड़ती हैं | `गर्मी की ऋतू ऐसी ‘ कविता की ये पंक्तियाँ इनके भाव को स्पष्ट करती नज़र आती हैं -`तन जलता /मन बहुत मचलता /दिन निकले कैसे /शुष्क नदी में/मीन तड़पती /बिन पानी जैसे /ताल -तलैया सूख गए हैं /पोखर सब सिमटे ‘| बसंत ऋतू जहां नव -पल्लव और चारो तरफ हरियाली .हर्ष उल्लास लाती है ,तो कवयित्री उसे भी भाव में भर कर `आया बसंत झूम के ‘ कविता में लिखती हैं `आया बसंत झूम के ,आया बसंत /अमवा की डाल बैठ कोयल/ कूकती है झूम के/आया बसंत झूम के ,आया बसंत ‘| इसके अलावा कवयित्री प्रकृति को क्रूर कहने से भी नहीं चूकती है `प्रकृति भी कितनी क्रूर है ‘? कविता की ये पंक्तियाँ `सूरज कहीं दुबक गया /और वक़्त भी सहम गया /रात भी ठिठुर गई /प्रकृति भी कितनी क्रूर है ‘? वास्तव में प्रकृति रूपी शक्ति सर्व व्यवहारों की जननी है | प्रकृति को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हर ऋतू को बराबर समय देना होता है |इससे वो कभी सुखद तो कभी दुखद लगती है |
यह शाश्वत सत्य है कि जितने व्यक्ति उतने विचार | हर व्यक्ति अपने ज्ञान ,चिंतन ,मनन और सृजन के आधार पर अपने भावों को प्रस्तुत करता है | यह भी सत्य है कि हर व्यक्ति प्रेमी व विरही भी होता है ,लेकिन उसकी स्मरण शक्ति ठीक हो| | कुछ अपने प्रेम व विरह को शब्दों में गढ़कर हमारे सामने रख देते हैं तो कुछ अपने अंदर ही अन्दर रख लेते हैं | कवयित्री डा. रमा द्विवेदी भी प्रेम और विरह दोनों पक्षों से अछूती नहीं रही हैं | इन्होंने दोनों विषयों पर अपने मन के उद्गारों को उद्घाटित किया है | `प्यार का इश्तहार नहीं करते ‘कविता की ये पंक्तियाँ उनके प्रेम को दर्शाती हैं |`ढाई आखर प्रेम को दिल में उतार लो /बस ताजमहल देख कर सरताज नहीं बनते |’ तो पीड़ा को विश्व का साम्राज्य दो’ कविता की पंक्तियाँ उनके विरह को उजागर करती नज़र आती है ,`जाओ हवाओं देश प्रिय के विरह के गीत गाओ तुम /जाओ घटाओं जाओ-जाओ विरहाग्नि न भड़काओ तुम |’ डा. रमा द्विवेदी के काव्य-संग्रह `रेत का समंदर ‘ में कोई भी पक्ष ऐसा नहीं लगता ,जिसे मानव ह्रदय से अलग किया जा सके अर्थात मानव ह्रदय से छूट गया हो | कवयित्री ने अपने इस काव्य -संग्रह में भाषा की सटीकता और शब्दों का ज्यों गुम्फन किया ,वह बहुत ही सराहनीय है |
`रेत का समंदर’ काव्य-संग्रह की विशेषता में केवल कवयित्री की आंतरिक अनुभूति और शब्द चयन ही नहीं है ,बल्कि सुविख्यात भाषाविज्ञानी और आलोचक प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी का काव्य -संग्रह के प्रारम्भ में ही ` संवेदनाओं की चितेरी रमा द्विवेदी ‘ में लिखा उनका आशीर्वचन और काव्य-संग्रह के प्रति उनकी प्रतिक्रया तथा भाव बहुत महत्वपूर्ण है | प्रो. गोस्वामी लिखते हैं कि `संवेदनाओं की चितेरी डा. रमा द्विवेदी हैं ,जिन्होंने अपने आस-पास की संवेदनाओं को सींचा है ,उकेरा है और उन्हें गहनतम बनाया है | उन्होंने अपनी कविताओं में जीवन के अनदेखे ,अनजाने और अनचीन्हे सत्य को उजागर करने का प्रयास किया है |’ डा. गोस्वामी ने इनके भाषा और लेखन विषय को दृष्टिगत करते हुए लिखा है कि `रमा जी ने अपने लघु बिम्बों और कम शब्दों में जीवन के विभिन्न पहलुओ को पिरोने का सफल प्रयास किया है | वास्तव में यथार्थ जीवन को अपने गीतों में नया संसार दिया है|’ डा. गोस्वामी जी के काव्य-संग्रह के प्रति निकले ये शब्द काव्य-संग्रह की लोकप्रियता और सार्थकता को स्पष्ट करते नज़र आते हैं ,`विश्वास है रमा जी भविष्य में भी अपने काव्य सृजन से हम पाठकों के साथ संवाद करती रहेंगी और अपने शब्दों से नए-नए बिम्ब और चित्र बना कर हमें जहां जीवन के विभिन्न अनछुए पक्षों से परिचित कराएंगी ,वह हमें आनंद भी प्रदान करेगी |’ डा. गोस्वामी जी की कलम से निकले ये शब्द उनकी आलोचना दृष्टि को भी दर्शाते हैं|
काव्य संग्रह के प्रारम्भ में अमेरिका से प्रवासी भारतीय एवं गीतकार श्री राकेश खंडेलवाल द्वारा लिखा `गुनगुनाते ख्याल ‘ भी डा. रमा द्विवेदी के काव्य-संग्रह `रेत का समंदर ‘ की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है | एक गीतकार जब अपनी पैनी नजरो से काव्य की पंक्तियाँ पढ़ता एवं देखता है तो वह काव्य के प्रति अपनी वाणी को विराम नहीं देता ,बल्कि उसके प्रति कुछ खट्टे -मीठे शब्दों का चयन अवश्य करता है | श्री खंडेलवाल जी लिखते हैं कि `रमा जी अपनी विलक्षण प्रतिभा से भावनाओं को नया आयाम देती रहती हैं | उनकी कविताओं में जहां एक नएपन की खुशी दृष्टिगत होती है ,वही कल्पना और अभिव्यक्ति का अनोखा समिश्रण भी देखने को मिलता है |’ इतना ही नहीं रमा जी के काव्य की विशेषता के विषय में वे लिखते हैं कि `उनकी गज़लों में विद्वतजनो को बहर ,रदीफ़ और काफिया की त्रुटियाँ भले ही दिखाई दे परन्तु भावनाओं की उनमें कहीं भी कमी नहीं है|’
अंत में यही कहा जा सकता है कि डा. रमा द्विवेदी का काव्य -संग्रह `रेत का समंदर ‘अपने आप में एक पूर्ण काव्य-संग्रह है | इसमें मानव ह्रदय की जिज्ञासाओं के साथ -साथ प्रकृति , माया ,मृत्यु सभी जीवन सत्य को उजागर करनेवाली कविताओं की रचना की गई है | रमा जी के काव्य की एक विशेषता यह भी है कि वह गीत ,मुक्तक,हाइकु ,क्षणिकाएं ,कविताओं के साथ-साथ ग़ज़ल विधा में भी अपनी लेखनी चलाती हैं अत:आज की काव्य परम्परा में रमा जी का विशिष्ट स्थान माना जा सकता है |
साभार: ‘भाषा’ पत्रिका, मार्च-अप्रैल-२०११ अंक