गीतांजली वार्ष्णेय – नारी/महिला – साप्ताहिक प्रतियोगिता

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तुम पुरुष हो ये माना सशक्त हो
लौह तन तुम्हारा मन  भी कठोर हो गया,अपनी कठोर शक्ति का तुझे अहंकार हो गया,नारी की कोमलता को मान कमजोरी पुरुषत्व मोह हो गया।कोमल हैं कमजोर नहीं शक्ति का नाम ही नारी है,जग को जीवन देने  वाली,जग तुझको भूल गया।क्योंकि——–कभी अम्बा कभी दुर्गा कभी काली है,नारी क्यों नहीं सिर्फ एक नारी हैं।कभी बेटी कभी पत्नी कभी माँ बहन बनकर समाज को जीवंत बनाया है,क्यों नहीं एक नारी बन कर अपना अस्तित्व बचाया है।नारी तू नारी पर ही क्यों भारी है,नारी तू क्यों नहीं सिर्फ एक नारी है।।”आँचल में दूध और आँखों में पानी,औरत तेरी यही कहानी”बन सानिया,मैरी कॉम, इसबात को झुठलाया है,ममता का दूध भरा ये आँचल आसमान पर लहराया है,”ढोल गवार शुद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी”कर ताड़ना का विरोध रामायण बदलनी हैबन गार्गी,अपाला फिर पहचान बनानी है।नारी तू क्यों नहीं सिर्फ एक नारी है।।कभी सीता,कभी अहिल्या बन ख़ुद को मिटाया है,क्या किसी पुरुष ने भी कभी कोई प्रमाण दिखाया है,फिर क्यों,फिर क्यों पुरुष तेरी अस्मिता पर  भारी है। नारी तू क्यों नहीं सिर्फ एक नारी है।।तू ही शक्ति तू ही जननी,तू ही वो नारी है,जिसे बनाकर देवताओं ने भी अपना स्वर्ग बचाया है,आज फिर वक्क्त वो आया है बन कर शक्ति नारी की अपनी अस्मिता बचानी है।नारी तू सिर्फ एक नारी है,सिर्फ एक नारी है।।


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