गुरुदेव – सूर्य प्रकाश उपाध्याय

हे यतिवर शत्-शत् प्रणाम!
काषाय वस्त्र त्रिदण्ड धरे,
यज्ञोपवित शोभित कृशतन।
कर वाम कमण्डल राजत है,
अमृत बिखेरता कमल नयन।
बैठे रसाल तरु के तल में,
पर्णशाल पुष्प दल से मण्डित।
सब वेद, शास्र,उपनिषद तापसे,
नास्तिक होते खण्डित।
जप योग विराग समाधि लिये,
ज्योति ललाट ऊधर्व पुण्ड किये।
मंगल उडेलता पर्णकुटी,
अंतर्यामी गो क्षीर पिये।
सर्वत्र सुगंध सुहावन है,
कर्पूर, अगर, तुलसी दल से,
पावत मनवांछित फल सबही,
भव त्राण मिटे कलीमल से!
जय गुरुदेव धन,धर्म,धाम,
हे यतिवर शत्-शत् प्रणाम!