गुरु, अध्यापक – डॉ.बी.निर्मला

अज्ञान से ज्ञान,अंधेरे से प्रकाश,
अशिक्षित से शिक्षित,अबोध से बोध,अवगुण से गुणवान,कुमार्ग से सुमार्ग,असभ्य से सभ्य, बुधिहीन से बुद्धिमान,असंभव से संभव,पाप से पुण्य,असत्य से सत्य की राह ले जानेवाला गुरु है।

किसी के लिए भगवान,ऋषि, मुनि,महापुरुष,माता पिता,बुजुर्ग, अध्यापक,मित्र,प्रकृति,अन्य भी गुरु हो सकते हैं।

मगर ज्ञान का प्रथम पाठ पढ़ाने वाले
अध्यापक की भूमिका सबसे अहम है। यह हमें जीवन की पाठशाला में विभिन्न अनुभवों से परिचय कराता है, हमारे बचपन को एक नया रूप देकर,हमें तराशकर,हमारे भावी चारित्र का निर्माण करता है।

कहते हैं कि बिना गुरु के हमारा जीवन व्यर्थ है,बड़े बड़े कवियों, महापुरुषों ने इसकी महत्ता को माना,स्वीकारा है।जीवन में अपनी उपलब्धियों,सफलता का श्रेय देते हुए,इन्हें आत्मा परमात्मा के मिलन का सेतु माना।

सच्चा गुरु वही है,जो अपने शिष्य को अपने ज्ञान की आग में तपाकर खरा सोना बना दे,जो उसके लिए माता पिता, अभिभावक,सलाहकार, मित्र के रूप में अपना अमूल्य योगदान दे,अपने आप को न्योछावर कर दे।

जैसे भाषा के बिना साहित्य अधूरा है,वैसे ही एक सच्चे गुरु के बिना विद्यार्थी का ही नहीं,हम सबका जीवन अधूरा है,अधूरा है।