गोरख नाथ पाण्डेय  – देश,नागरिक – साप्ताहिक प्रतियोगिता

विश्व  की  रंगीनियत  से  लाख  अपना  दिल लगाये,
दिल के मन्दिर  में  मगर  इस देश का दीपक जलाये.
पँख  को  आकाश   सौंपे  गगनभेदी   बन  उड़े  पर,
अपनी  जननी  से  जुड़े  आशीष  ले  रिश्ता  निभाये.

भारती के भाल  पर  हिमराज  का मुकुट सुसज्जित,
पावँ में पायल की  झनझन  सी  पयोधि  हिन्द भी है.
कर  में  दिनकर  कैद  कर  उषा  कराती  सात बहने,
सोचता  हूँ  सृष्टि  में  क्या   हिन्द  के  मानिंद  भी  है.
पीर  हो   पंजाल  का   या   नीर   पेरियार  का  हो,
कार्डमम  से   कारकोरम  एक  तन  है  एक  मन है,
गिर  से  गारों   तलक   गिरराज   चूमे  गगन  सारा,
तीन रंगो  की  चुनरिया  मे  लहरता  एक  सपन है!
चीर क्या है खीर  क्या  है  हमने  बतलाया जहा को,
सभ्यता  को   सभ्य   होना  गर्व   है  हमने  सिखाये.
विश्व की रंगीनियत से – – – – – – – – – – – – – 

हमने  पहुचाये   है   रॉकेट   सैटेलाइट  या  मिसाइल,
व्योम   का   माथा  भी   हिंदुस्तानी   रंगो  से  रँगा है.
जब कभी  देखा  फलक  पर   इंद्रधनुषी  रंग  जाना,
आर्यावर्त  का  ले  तिरंगा  शायद  ईश्वर  भी  फना है.
हमने बतलाया  जहाँ  को  जीरो की वैल्यू है कितनी,
हमको  पाई   मान   व दशमान  लेने  की   कला है.
स्वच्छ  रहना  स्वस्थ  रहना  ही सदा  हमने सिखाये,
योग के  उपयोग   का  अवसर  हमे  पहले  मिला है.
ये   मनीषी   चेतना  चहुँओर  चमकी   है   जगत  में,
अपनी  दुनिया  छोड़कर  गैरों की हम दुनिया बनाये.
विश्व की रंगीनियत – – – – – – – – – – – – – – – 

इस  जमी   ने  जन्म   देकर  धर्म   को  ईश्वर बनाया,
जाने  कितने  दर्शनों  से  इस  धरा  का  कर सना है.
भास्कर  के ही  भँवर से  धर  के अपना सर सरासर,
जगत  के  निलय  में  सुरपुर  का कोई जुगनू तना है.
सिंह  के  दांतों  को  गिनने  का  हुनर  हम जानते है,
उदधि  के  उदर को  मथकर  हम सुधा को छानते है.
रत्नगर्भा    गर्भ    से    हीरा    नही   कोहिनूर   देती,
इस चमन   में   ही  सदा   होती  रही  सोने की खेती.
धन्य  है  हम  इस धरा  पर  जन्म  पाकर गीत गाकर,
कोख  में  इस  मातृभूमि  की  हम  सौ  सौ बार आये.
ऐसी   बसुधा  के   लिए   बैकुंठ   को   ठोकर लगाये.
विश्व की रंगीनियत से – – – –