चुनौतियों का हठयोग और एक योगी की परीक्षा

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वैदिक संस्कृत में योग का मतलब होता है जोड़ना और जोड़ने का उद्यम करने वाले को योगी कहा जाता है. आध्यात्मिक अर्थ में तो योग का मतलब है व्यक्ति का समष्टि में या ईश्वरत्व में विलीन होकर एक हो जाना.

मगर योगी आदित्यनाथ के लिए दुनियावी या सांसारिक सत्ता हासिल करने के बाद यह चुनौती बेहद भीमकाय हो गई है. अगर उत्तर प्रदेश एक देश होता, तो अपनी 20.40 करोड़ आबादी के साथ यह दुनिया का पांचवां सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला मुल्क होता.

धर्म, जाति, समाज, अर्थव्यवस्था और भूगोल, हर लिहाज से अपनी चरम विविधता और तीखे बंटवारों के लिए मशहूर इस राज्य को एकसूत्र में बांधे रखना देवताओं तक के लिए चुनौती होता.

बातचीत में योगी आदित्यनाथ कुछ ऐसा जताते हैं कि हिंदुस्तान के सबसे ज्यादा आबादी वाले सूबे का मुख्यमंत्री होने का दायित्व किसी दैवीय विधि-विधान से उन्हें प्राप्त हुआ है. लखनऊ के बीचोबीच अपने सरकारी आवास में, जहां बैठकर वे आगंतुकों से मिलते और बातचीत करते हैं, सोफे पर भगवा आवरण चढ़ाकर बहुत कुछ जाहिर कर दिया गया है.

अपनी पहचान बन चुके भगवा वस्त्रों में वे इस ओहदे के साथ आई सत्ता का इस्तेमाल करते हुए खुश जान पड़ते हैं और हाल के वक्त में उन्हें जो गंभीर झटके झेलने पड़े, उनके बावजूद आत्मविश्वास से सराबोर दिखाई देते हैं.

राजपाट मिलने के बिल्कुल शुरुआती जोश में उन्होंने उत्तर प्रदेश में 15 साल के अंतराल के बाद भाजपा की सरकार के लौटने की मुनादी करने की गरज से कुछ सरकारी इमारतों और बसों तक को नए सिरे से भगवा रंग से पोत देने का फरमान दे डाला था.

जब इंडिया टुडे ने उनसे पूछा कि क्या इस तरह सत्ता का ओहदा ग्रहण करना एक योगी के लिए सही रास्ता है, उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा, “जब राजा रास्ता भटक जाते हैं, तब ऐसे उदाहरण हैं कि योगियों और संन्यासियों ने जिम्मेदारी संभाली है.

कोई योगी और संन्यासी ही बेहतर नतीजे दे सकता है.” उन्होंने अपनी नई जिम्मेदारी को जायज ठहराते हुए यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश की बर्बादी के लिए “बीते दशक के राज्य के आलसी नेता जिम्मेदार हैं.

निहितस्वार्थों की राजनीति और कमजोर नेतृत्व की वजह से राज्य को नुक्सान उठाना पड़ा है. उन्होंने संस्थाओं को नष्ट किया और राज्य को बर्बादी कगार पर धकेल दिया. पिछले दशक में लोगों के दिमाग में जो नकारात्मक धारणाएं बन गई थीं, पिछले एक साल में हम उन्हें बदलने में सफल हुए हैं.”

मार्च 2017 में गोरखनाथ मठ के महंत जब सबको चकित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के ओहदे के लिए चुने गए, तब वे मीडिया का ध्यान खींचने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक से होड़ करते दिखते थे.

भगवा हलकों में चर्चा थी कि बहुत मुमकिन है कि तीखे और विभाजनकारी बयानों के लिए मशहूर यह नेता मोदी के हिंदुत्व का उत्तराधिकारी हो. मगर बीते कुछ महीनों में मुश्किलें उनके लिए ट्रकों में भरकर आई हैं—इनमें से कुछ मुश्किलों को तो खुद योगी ने न्यौता दिया है.

उनके राजकाज का पहला साल वाकई अग्निपरीक्षा जैसा रहा और आदित्यनाथ इसमें बुरी तरह झुलस गए.

इसने हिंदी हृदयप्रदेश के भगवा बाहुबली होने के उनके आभामंडल में सुराख तो कर ही दिए हैं, साथ ही हिंदुस्तान के सियासी तौर पर सबसे अहम सूबे की हुकूमत चलाने की उनकी काबिलियत को लेकर भी गंभीर संदेह पैदा कर दिए हैं.

हालांकि ज्यादातर लोग मानते हैं कि वे हाल के वर्षों में राज्य के सबसे कर्मठ और मेहनती मुख्यमंत्रियों में हैं.

उनका दिन बेहद थकाऊ और व्यस्त कार्यक्रमों में गुजरता है, जो तड़के 4 बजे शुरू होता है और मध्यरात्रि तक चलता है.

उनकी निजी ईमानदारी पर कतई कोई सवाल नहीं है और देश के सबसे भ्रष्ट सूबों में शुमार इस राज्य में उन्होंने पारदर्शिता और साफ-सुथरे लेनदेन पर बेहद कड़ाई से जोर दिया है.

राज्य के बड़े मुद्दों को सुलझाने की उन्होंने अपनी तरफ से बेहतरीन कोशिश की है—परेशानियां झेलते किसान, विकास के कामों को खराब ढंग से अंजाम दिया जाना, क्षेत्रीय असंतुलनों को दूर करना और निवेशकों को लुभाकर वापस राज्य में लाना (देखें बातचीत ). उन्हें इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने राज्य में माफिया राज खत्म करने के लिए सरकारी ठेकों के लिए ई-निविदा प्रणाली शुरू की और बोर्ड की परीक्षाओं में नकल विरोधी उपायों की खुद निगरानी की.

आदित्यनाथ ने बागडोर संभालते ही हिंदुत्व के जिस एजेंडे पर कड़ाई से जोर दिया था, उसके बुरे नतीजों का भी उन्हें तीखा एहसास है. इनमें गोवध पर पाबंदी के नतीजतन होने वाले आर्थिक नुक्सान भी शामिल हैं. यही वजह है कि बाद में इस पाबंदी के साथ “ऐंटी-रोमियो” दस्तों और “लव जेहाद” पर भी उन्होंने चाल धीमी कर ली. हालांकि वे मंदिर मुद्दे से नहीं डिगे और अयोध्या में भव्य दीवाली का आयोजन किया.

सरकार में भले ही उन्होंने अभी कोई अपनी छाप न छोड़ी हो, पर आवास और स्वच्छता की केंद्र प्रायोजित योजनाओं को लगन और तत्परता से लागू किया है. साथ ही, उन्होंने राज्य के किसानों की मांगों को पूरा करने के लिए खासी दरियादिली दिखाई है और इसमें उनके कुल 36,000 करोड़ रु. के कर्ज माफ करना भी शामिल है.

हालांकि सरकार चलाने की नातजुर्बेकारी अपनी कीमत वसूल रही है और यह हकीकत आग में घी का काम कर रही है कि उनके मंत्रिमंडल के ज्यादातर साथी भी नौसिखुए हैं. राज्य का खजाना बेहद जर्जर हालत में है.

उनकी सरकार को राज्य के ऊंचे राजकोषीय घाटे और कर्ज के बोझ को कम करने का ठोस रोडमैप अभी बनाना है. राज्य की कर्ज देनदारी तो चौंकाने वाली हद तक जीएसडीपी की 30 फीसदी जितनी ज्यादा है, जो राजकोषीय अनुशासन वाले दक्षिणी राज्यों से दोगुनी है.

यही नहीं, इतने विशाल राज्य को चलाने के लिए एक मजबूत, तजुर्बेकार और फैसले लेने वाले नेता की जरूरत है, जो जानता हो कि सियासत और प्रशासन के बीच संतुलन बिठाकर कैसे उसका असरदार इस्तेमाल किया जाए.

मगर योगी सत्ता की बहुत-से केंद्रों से घिरे मालूम देते हैं जो उनकी स्वतंत्र फैसले लेने की काबिलियत को जंजीरों में जकड़ देती हैं. इनमें सबसे अव्वल तो प्रधानमंत्री कार्यालय है जो उनके कामकाज और तरक्की पर करीब से नजर रखता है, तब तो और भी जब उनकी सरकार का कामकाज 2019 में मोदी के दोबारा चुने जाने के लिए बेहद अहम है.

फिर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह हैं जिन्हें राज्य से पार्टी के सांसदों और विधायकों के अलावा सहयोगी दलों की खींचतान और दबावों में संतुलन बिठाना होता है.

उनके दो उप-मुख्यमंत्री भी हैं, जिनकी उनके प्रति कोई निजी वफादारी नहीं है, उसी तरह जैसे उनके बहुत सारे दूसरे मंत्रियों की भी नहीं है. तिस पर अफसरशाही तो है ही, जिसे राज्य में सत्ता के छिन्न-भिन्न ढांचे का चालाकी से इस्तेमाल करके अपना काम निकालने और नतीजतन राजकाज को ठप कर देने में महारत हासिल है.

विधानसभा में विपक्ष के नेता राम गोविंद चैधरी मजाक उड़ाते हैं, “सपा की हुकूमत के दौरान भाजपा हमेशा कहती थी कि राज्य में साढ़े पांच मुख्यमंत्री हैं.

मगर अब भाजपा के मातहत राज्य में आठ मुख्ययमंत्री हैं—मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ दो उप-मुख्यमंत्री, भाजपा के राज्य अध्यक्ष, भाजपा के राज्य महासचिव, आरएसएस, पीएमओ और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राज्य के सुपर सीएम की तरह काम कर रहे हैं.”

योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा को तब गहरा धक्का लगा जब भाजपा हाल ही में राज्य की दो बेहद अहम लोकसभा सीटों—गोरखपुर (जहां से योगी आदित्यनाथ पिछले साल इस्तीफा देने से पहले पांच बार चुने गए थे) और फूलपुर (जहां से उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने राज्य मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद इस्तीफा दिया था)—के उपचुनाव हार गई.

यह हार योगी के लिए न केवल निजी अपमान का सबब बनी बल्कि इसने उनके जमीनी हकीकत से कटे होने की कड़वी सचाई को भी उजागर कर दिया.

इसने पार्टी को झकझोर कर रख दिया, क्योंकि उसकी मुट्ठी से एक अहम जीत छीन लेने के लिए उसके दो कट्टर प्रतिद्वंद्वियों, समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने हाथ मिला लिया था.

अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब मार्च 2017 में भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने विधानसभा चुनावों में जबरदस्त बहुमत (403 में से 325 सीटें) हासिल किया था और 2014 में लोकसभा की ज्यादातर सीटें (80 में 73) अपनी झोली में डाल ली थीं. इन विराट जीतों के बाद आई उपचुनावों की इस हार ने पार्टी से अपराजेयता की चमक छीन ली और 2019 के आम चुनाव में इतनी ही बड़ी तादाद में सीटें जीतने की उसकी काबिलियत पर सवालिया निशान लगा दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एससी/एसटी प्रताड़ना कानून 1989 के कुछ सख्त प्रावधानों में कुछ ढील दी. उसके बाद दलितों में जो रोष उपजा, उसे कुशलतापूर्वक संभालने में राज्य प्रशासन की नाकामी के बाद पार्टी की चिंताएं गहरा गई हैं क्योंकि प्रदेश में दलितों की संख्या कुल आबादी का 20.5 प्रतिशत है.

पहले लोकसभा चुनावों और फिर विधानसभा चुनावों में दलितों का अच्छा-खासा वोट प्राप्त करने के बाद भाजपा ने गर्व के साथ यह कहना शुरू किया था कि वह केवल सवर्णों की पार्टी नहीं है, उसे हर तबके का साथ मिलता है.

लेकिन दलितों के बीच इसकी छवि खराब हुई है. प्रदेश के एक दलित सांसद छोटेलाल खरवार ने मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को चिट्ठी लिखकर राज्य सरकार और पार्टी की प्रदेश इकाई द्वारा जातिगत आधार पर भेदभाव का आरोप लगाया है.

तीन अन्य प्रमुख दलित सांसदों ने भी राज्य सरकार द्वारा दलित समुदाय को प्रताड़ित करने के आरोप लगाए और यहां तक कह गए कि भाजपा तो आरक्षण को ही समाप्त करने की नीयत रखती है. इन आरोपों के जवाब में प्रदेश भाजपा ने दलित अधिकारियों की एक सूची जारी की और बताया कि सरकार के 25 शीर्ष पदों पर दलित अधिकारी बैठे हैं.

पार्टी प्रवक्ता डॉ. चंद्रमोहन कहते हैं, “पिछली सरकार ने दलितों की अनदेखी की थी जबकि योगी सरकार ने उन्हें भरपूर सम्मान और स्थान दिया है.”

इस बीच, अपराध के लिए कुख्यात रहे उत्तर प्रदेश से अपराधी तत्वों के सफाए के लिए कमर कस चुके मुख्यमंत्री के रूप में योगी को पेश करने का दांव अब उलटा पड़ता दिख रहा है. भाजपा ने विधानसभा चुनावों के दौरान सपा के शासन में खस्ताहाल कानून-व्यवस्था की बात जोर-शोर से उठाई थी और राज्य को अपराधमुक्त करने का वादा किया था.

मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद आदित्यनाथ ने अपराध के बढ़ते ग्राफ को देखकर राज्य पुलिस को पूरी छूट देकर अपराधियों के सफाए के लिए जो कुछ भी करना पड़े, सब करने की इजाजत दे दी.

पुलिस ने अपराधियों पर फंदा कसा और रोजाना चार की औसत से एक साल के भीतर 1,322 मुठभेड़ों में विभिन्न अपराधों में नामित 44 आरोपियों को मार गिराया. अब ये आरोप लगने शुरू हो गए हैं कि इनमें से कई मुठभेड़ें फर्जी हैं. पुलिस पर यह भी आरोप लगा है कि वह बड़ी मछलियों पर हाथ डालने का साहस करने की बजाए छोटे-मोटे अपराधियों को मारकर अपना टारगेट पूरा कर रही है.

नोएडा के परथला गांव के एक जिम मालिक और इंस्ट्रक्टर 25 वर्षीय जितेंद्र यादव का एनकाउंटर उसका ताजातरीन उदाहरण है. 3 फरवरी की रात 10 बजे यादव अपने एक रिश्तेदार के रिसेप्शन कार्यक्रम से घर लौट रहे थे.

वे एक पित्ज़ा आउटलेट के सामने रुके थे कि तभी वहां सब-इंस्पेक्टर विजय दर्शन आया और कहा कि कार में तेज बज रहे म्युजिक सिस्टम की आवाज धीमी करो. यादव ने ऐसा करने से मना किया तो दोनों के बीच तीखी नोक-झोंक जल्द ही झगड़े में बदल गई और दर्शन ने यादव को गाड़ी से बाहर खींचकर गोली मार दी.

उसके बाद दर्शन ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को फोन करके एनकाउंटर की जानकारी दी. यादव के परिवार ने इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई और आरंभिक जांच में मामला कुछ और जान पड़ा. दर्शन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया जबकि घटना के वक्त मौजूद तीन अन्य पुलिसकर्मी सस्पेंड हुए.

राज्य के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. सिंह कहते हैं, “हम पुलिसवालों पर नजर रख रहे हैं. कोई भी पुलिसवाला अपराध में लिप्त पाया गया तो कड़ी कार्रवाई होगी.” दोषी पुलिसकर्मियों को दंडित किया जा रहा है फिर भी ऐसी छवि बन गई है कि पुलिस अंधाधुंध एनकाउंटर कर रही है.

मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ी गले की फांस यह बात बन गई है कि वह अपराध में लिप्त पाए जाने पर भी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ ऐक्शन नहीं ले पाते. 8 अप्रैल को एक 17 वर्षीया युवती ने मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की.

उस युवती का कहना था कि भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर ने उसके साथ बलात्कार किया है पर पुलिस उसकी शिकायत पर विधायक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही है इसलिए वह जान देना चाहती है.

अगले दिन उन्नाव जेल में उस युवती के पिता की मौत हो गई. आरोप है कि पुलिस और विधायक के लोगों ने पुलिस हिरासत में रहने के दौरान उसकी पिटाई की थी जिसके कारण उसकी मौत हुई. हालांकि इस मामले में चार लोगों की गिरफ्तारी हुई है लेकिन आरोपी विधायक पर मामला दर्ज मामले की सीबीआइ जांच की सिफारिश की गई है.

इसी तरह कासगंज में गणतंत्र दिवस को मुस्लिम बहुल इलाके से हिंदुओं के एक गुट के तिरंगा यात्रा निकालने और पाकिस्तान विरोधी नारे लगाने के दौरान हुई हिंसा के बाद हुई कार्रवाई के दौरान प्रशासन के निष्पक्ष नहीं होने के आरोप लग रहे हैं.

जब बरेली के जिलाधिकारी आर.वी. सिंह ने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर “जान-बूझकर मुस्लिम बहुल इलाकों से ऐसी यात्रा निकालने और हिंसा भड़काने” की बढ़ती प्रवृत्तियों पर कटाक्ष किया तो उनका तबादला कर दिया गया. फिर 2013 के मुजफ्फरनगर और शामली में दंगे के आरोपियों से मुकदमे वापस लेने के उनकी सरकार के फैसले से मुसलमानों में अलगाव बढ़ा है.

विपक्षी दल आदित्यनाथ के अब तक के कामकाज को बेहद खराब बताते हैं. पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने इसे “एक साल, बुरी मिसाल” बताया. मायावती के बाद मुख्यमंत्री बने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा, “इस एक साल के कार्यकाल में भाजपा सरकार के पास दिखाने के लिए ऐसा कोई कार्य नहीं है जो उसने शुरू किया हो. मुख्यमंत्री उन प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन कर रहे हैं जिन्हें मैंने पूरा कराया था.”

वैसे आदित्यनाथ के आलोचक जितना बता रहे हैं, वास्तव में हाल उतना बुरा भी नहीं है. वे अगर संजीदगी से काम लें तो अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. सपा और बसपा के साथ आने के दौर में भाजपा नेतृत्व को आदित्यनाथ में ही उम्मीद दिखती है. वे ही हिंदुत्व के मुद्दे को आगे ले जा सकते हैं. अयोध्या मामले में कोर्ट के फैसले के मुताबिक वे ही सही दिशा दे सकते हैं.

इस बीच वे राज्य का काफी दौरा कर चुके हैं और फीडबैक के लिए उन्होंने अपना खुद का जमीनी नेटवर्क तैयार कर लिया है. एक साल में उन्होंने यह समझना भी शुरू कर दिया है कि राज्य में क्या किए जाने की जरूरत है.

(अखिलेश ने भी बहुत धीमी गति से शुरुआत की थी और मुख्यमंत्री के रूप में पहला साल तो चीजों को समझने में ही निकल गया था.) मुख्यमंत्री को सबसे पहले तो विभिन्न योजनाओं की तरक्की को लेकर अधिकारियों के दावों पर विश्वास करना बंद कर देना चाहिए और उनकी निजी तौर पर निगरानी करके उनका प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन करना चाहिए.

उदाहरण के लिए, शहरी क्षेत्रों में चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति के उनके दावों की तब खिल्ली उड़ जाती है जब राजधानी लखनऊ में ही लगातार बिजली गुल होती रहती है. इसी तरह, 90 दिनों के भीतर राज्य की सड़कों को गड्ढामुक्त करने का उनका दावा खराब क्रियान्वयन के कारण झूठा साबित हो जाता है. आदित्यनाथ को मंत्रियों और अधिकारियों की एक ऐसी कोर टीम भी बनानी चाहिए जिस पर वे भरोसा कर सकें.

यह पूछे जाने पर कि क्या मुख्यमंत्री की भूमिका का आनंद आ रहा है, आदित्यनाथ कहते हैं, “मेरे दिमाग में यह बात एकदम साफ है कि यह कुर्सी आनंद के लिए नहीं है. मैं इसे प्रदेश और राष्ट्र की सेवा के लिए मिली कुर्सी के तौर पर लेता हूं.

मेरा कोई निजी जीवन है ही नहीं.” आने वाले महीनों में उन्हें धार्मिक और पक्षपातपूर्ण विचारों से ऊपर उठकर यह साबित करना होगा कि एक संन्यासी राज्य को दूसरे के मुकाबले ज्यादा बढिय़ा चला सकता है.

टीम योगी

राजीव कुमार- मुख्य सचिव उत्तर प्रदेशएस.पी.गोयल- मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव, मृत्युंजय कुमार नारायण-मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिव, अनूप चंद्र पांडेय-अतिरिक्त मुख्य सचिव, उद्योग, अवनीश अवस्थी-प्रमुख सचिव, सूचना, राज प्रताप सिंह, आयुक्त कृषि उपज, अरविंद कुमार- प्रमुख सचिव गृह, ओ.पी. सिंह पुलिस महानिदेशक


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