डॉ नीरज अग्रवाल – आदमी/पुरुष – साप्ताहिक प्रतियोगिता

0 commentsViews:

ख़ुद का वजूद भुलकर भटका है आदमीचेहरे पे लगा चेहरा बदला है आदमी ।।
वक़्त और ज़रूरत से बदली हैं फ़ितरतेमुखौटों के आवरण में लटका है आदमी ।। 
जज़्बात ख़्वाब मुहब्बत,नक़ली हुई है दोस्तबेवक्त ज़रूरत से बिकता है आदमी ।।
नायाब कलाकर हुआ शक्लें बदल बदल हर भाव मुखौटे में छुपाता है आदमी ।।
दर्द ख़ुशी ग़म ,दिल में दफ़न हुएमुखौटेसे से , झूठा ग़म जताता है आदमी।।
हसरत और मुहब्बत का मुखौटा लगा लिया विश्वास और वादों को डराता है आदमी ।।
सिसक रहा सत्य,मुखौटों की गिरह मेंदर्द मुखौटों मे दफ़नाता है आदमी ।।
नीरज” ने बहुत ढूँढा,मुहब्बत का मसीहामुखौटों की भीड़ में,खोया वी आदमी ।।
कोई दर्द छुपा रहा कोई ख़ुशियाँ छुपा रहाकोई झूठ मुखौटे के, लगाता है आदमी।
छुप गई पहचान, मुखौटों के दरमयान साज़िशें संगीन छुपाता है आदमीं ।।

आदमीचेहरे पे लगा चेहरा बदला है आदमी ।।
वक़्त और ज़रूरत से बदली हैं फ़ितरतेमुखौटों के आवरण में लटका है आदमी ।। 
जज़्बात ख़्वाब मुहब्बत,नक़ली हुई है दोस्तबेवक्त ज़रूरत से बिकता है आदमी ।।
नायाब कलाकर हुआ शक्लें बदल बदल हर भाव मुखौटे में छुपाता है आदमी ।।
दर्द ख़ुशी ग़म ,दिल में दफ़न हुएमुखौटेसे से , झूठा ग़म जताता है आदमी।।
हसरत और मुहब्बत का मुखौटा लगा लिया विश्वास और वादों को डराता है आदमी ।।
सिसक रहा सत्य,मुखौटों की गिरह मेंदर्द मुखौटों मे दफ़नाता है आदमी ।।
नीरज” ने बहुत ढूँढा,मुहब्बत का मसीहामुखौटों की भीड़ में,खोया वी आदमी ।।
कोई दर्द छुपा रहा कोई ख़ुशियाँ छुपा रहाकोई झूठ मुखौटे के, लगाता है आदमी।
छुप गई पहचान, मुखौटों के दरमयान साज़िशें संगीन छुपाता है आदमीं ।।


Facebook Comments