डॉ नीरज अग्रवाल – नारी/महिला – साप्ताहिक प्रतियोगिता

 भारत माँ के उर ललाट में, अपनी शौर्य कहानी थी।समर भूमि के शंखनाद में,महिला हिंदुस्तानी थी।।
शिखर लांघ दिया बाछेंद्री ने,और दिव्यांग अरुणिमा ने,भेद दिया अंतरिक्ष का दामन,हिदुस्तानी कल्पना ने।एवरेस्ट से अंतरिक्ष तक, तेरी अमर कहानी थी।
समर भूमि के शंखनाद में…..महिला हिदुस्तानी थी।
बाज बहादुर हुआ पराजित,दुर्गावती ललकार उठी।धूल चटा दी अंग्रेजो को, मनु की जब तलवार उठी। रणचंडी बन रन भूमि में, गरजी झांसी की रानी थी।
समर भूमि के शंख नाद में…महिला हिदुस्तानी थी।
अपने लाल को खोया जिसने,माँ का फर्ज निभाने को।राज धर्म की लाज बचाई, कुल का दीप जलाने को।  वचन निभाया लाल गवां कर,वो पन्ना बलिदानी थी।
समर भूमि के शंखनाद में…..महिला हिदुस्तानी थी।
प्रेम किया तो राधा बन गई,अग्नि परीक्षा में सीता।बनी अहिल्या और अनसुइया, भागीरथी  अनुपम गीता।भक्ति भाव में गरल पी गई,वो मीरा दीवानी थी।।
समर भूमि के शंखनाद में….महिला हिंदुस्तानी थी।
महादेवी सी बनी लेखिका,लता सा कोकिल गान किया। बनी धविका खेलकूद में, देश का अपने नाम किया।आन पड़ी जब जब भी विपदा,गढ़ती नइ कहानी थी..!
समर भूमि के शंखनाद में….महिला हिंदुस्तानी थी।
पनघट से घूँघट तक रहकर, मजदूरी शिक्षिका भी बनकर,हार न मानी संघर्षों से, तोड़ रही  है पथ पर पत्थर।जौहर भी दिखलाया जिसने, वो पद्मावती रानी थी।
समर भूमि के शंखनाद मे महिला हिदुस्तानी थी।
महिला ममता की मूरत है, प्रेम त्याग सेवा सत्कार।महिला अगर पुष्प सी कोमल, महिला ही फिर बने कटार।पावन  गंगा भगीरथी भी, देवी दुर्गा कल्याणी  भी।समर भूमि के शंखनाद में, महिला हिदुस्तानी थी।