डॉ बी निर्मला – नव वर्ष – साप्ताहिक प्रतियोगिता

हर कहीं सुनाई दे रही है,कुछ कुछ आहट,फुसफुसाहट,और हलचल की,धीरे धीरे सबके जीवन में आगाज़ हो रही है नव वर्ष की। चुनौतियों से भरा गुजर गया, पिछला साल बड़ी जल्दी से, अभी संभले नहीं,आ खड़ा हुआ,नव वर्ष बड़ी फुर्ती से। अभी अभी तो सूरज को भी ग्रहण लगा था,देखो कैसे अंधेरा चीर, शान से बाहर निकल आया है, हमें भी उससे सबक ले,जीवन में कुछ कर दिखाना है। नहीं करना हमें अंधाधुंध अनुसरण, विदेशी सभ्यता और संस्कृति का,कर स्वागत केक, कोक और पेप्सी से न्यू ईयर का, ले आशीर्वाद बड़ों से,करेगें काम दान, पुण्य और परोपकार के,नव वर्ष में रखेंगे मान अपने देश की संस्कृति और सभ्यता का। बहुत उथल पुथल मची धरती, अम्बर में, प्रकृति ने भी दिखाया अपना प्रकोप,आग, बाढ़,आंधी और तूफानों ने भी मचाया शोर, टूटे,उजड़े,चमन और जंगल, हुई धरती बंजर गत वर्ष, हे मानव,अब अाई तेरी बारी बो दे सबके दिलों में स्नेह,प्यार,शांति के बीज,नहीं चलाना कोई जहरीला खंजर इस नव वर्ष । भुला देना है हमें पिछले सारे गिले, शिकवे,और गमों को,स्नेह और प्यार से गले लगा हम सभी को नव भारत का निर्माण करना है।