डॉ सुरिन्दर कौर – गणतंत्र दिवस, संविधान– साप्ताहिक प्रतियोगिता

कई दीप बुझे थे आंखों के
कई आंगन हो गये सूने थे
जो ओढ़ शहीदी आए थे
आजादी के दीवाने थे
कई बहनों की टूटी राखी
कई मांओं की सूखी छाती
कई बाल पिता को तरस गये
बेमौसम पतझड़ बरस गये
मेंहदी सिसकी कई हाथों की
नींदें तड़पी कई रातों की
कई घरों ने बेटे खोए थे
बाबा छिप- छिप के रोए थे
तब मिली तिरंगे को पहचान
अपना गणतंत्र दिवस महान।

पाई आजादी न खोएं
नफ़रत के बीज नहीं बोएं
हर फूल की खुशबू भारत में
हो अमन चैन अब भारत में
अब न हो कोई बम गोली
बारूद से न खेलें होली
हम एक हैं जग को दिखा देंगे
शत्रु को सबक सिखा देंगे
मस्जिद,गिरजा या शैवाले
इंसानियत के रखवाले
न जख्म, दर्द हो,न आहें
दिल बड़ा रहे फैली बांहें
यही सिखाता संविधान
अपना गणतंत्र दिवस महान्।

न तीरों से तलवारों से
उबले भावों की धारों से
शब्दों में हम अग्नि धरते
वीरों में हम साहस भरते
लेखन की कला दिखाते हैं
हम कलम से वाण चलाते हैं
सरहद की दीवार हैं हम
कश्ती,नाविक,पतवार हैं हम
तोड़ी हैं मां की जंजीरें
टकरा भी सकते शमशीरें
हम पन्नों पे बिछ जाते हैं
कवि हैं,हर काल बनाते हैं
हमें जान से प्यारा हिंदुस्तान
अपना गणतंत्र दिवस महान्।