तस्मै श्री गुरवे नमः – दीपक अनंत राव “अंशुमान”

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मनुष्य की पहचान उनकी सांस्कृतिक घरातल पर၊
कुच्छ करना,करके दिखाना उस पर
आदमी का ध्येय भी रहता है၊
नामोनिशान करके,समाज के दिल को
जो जीता है,वह महान कहलाता हैं၊
शिला युग में गुफ़ाओं में जीकर,
बिना पकाये मांस खाकर भडकते इंज़ान,
धीरे धीरे अपनी एक नई संस्कृति को धारण किया।
जीवन का अर्थ भी,जागता जग से अपनाया
शब्द की व्युत्पत्ती,भाषा की गरिमा,
क्षर से अक्षर और अक्षर से वाक्य၊
उन वाक्यों से बताने का मतलब,साथ में
उनकी सामाजिकता का बोध एवं रंग बिरंगे यह संसार,
अब संस्कृतिक प्राणी है मनुष्य हर समाज में၊
पहले गुफ़ा में जैसे अंधकार भरा हुआ था
ठीक उसी प्रकार आदमी के मन में भी၊
कालचक्र के क्रमिक विकास में,
कुछ मनुष्य प्रकृति को पढने निहारने लगा၊
ज्ञान का संचयन अपने बोध में हुआ और वे अलग इंज़ान बन दूसरों के मन के अंधकार को धीरे धीरे दूर करने लगा၊
हर कही प्रकाश चमकने लगे ,और ज्ञान का अनूठा रस
लोग पीने लगे,आत्म ज्योति सी तत्थ का उदय भी
स्थगित हो गया၊
लोक उन्हें पुकारने लगे गुरु की संज्ञा से और
अपने को स्वयं शिष्य कहकर गुरु की छाया बन गया
हर समाज सुरक्षित है जहाँ श्री राम कृष्ण परंमहंस जैसे गुरु चमके और नरेन्द्र जैसे शिष्य गण पनपे
एक समाज,कल्पना,भाषा,राज्य,देश,संस्कृति,सभ्यता
सब गुरु का दूसरा नाम ही है
गुरु तेरा ज्ञान अपार महिमा अनंत