दीपक अनंत राव – जवान/फौजी/सैनिक – साप्ताहिक प्रतियोगिता

वे जीते नहीं,वे सोते नहीं,
सपनों को वे सोने पे पिरोते नहीं,
गद्यारों को छोडते नहीं,
दुश्मनों को वक्त वे देते भी नहीं၊၊

हर समाज की संपत्ति वे,
हर परिवार के चमकते उजियाले वे,
हर कोख का सौगंध हैं वे,
हमारी संस्कृति की परिचायक हैं वे၊၊

भारत माँ के सिरताज के हीरे हैं वे,
फहराती तिरंगे के शान हैं वे,
हिम्मत जिसका नाम हैं वे,
नस नस में बहती गंगा है वे ।

माँ-बाप का आन हैं वे,
बहन की सी सतरंग संजोए सपने है वे,
भैय्या का मान हैं वे,
और छोटू की हरियाली हैं वे ॥

हमारी मिट्टी का समर्थक है वे,
देश की ताल-तलैया है वे,
भारत का सुगंध हैं वे,
हर बोलों में प्रज्वलित होते रहे हैं वे ॥

सैनिक,वीर,जवान,फौजी,शहीद उनका नाम,
एक ही देश की कटपुतली,
हर सास में, सोच में,सफर में उन्हें,
कदर देना ही हमें ॥

कश्मीर में सियाचिन में,
हर बर्फीली इलाकों में,
भरे मन से,मज़बूत दिलों से,
कैलासनाथ के बराबर,
हमारी पहरेदारी,मज़बूत कन्धों से करते रहें၊
वे,वीर जवान अपना नींद छोडता,
तब देश आराम से सो जाता।
वे,वीर सैनिक जागकर पहरेदारी करते,
तब समाज,चैन से सपने बुनते,
हर क्षण,हर पल,अपने जीवन को न्योछावर करके
वे भारत वर्ष की आस्तित्व को कायम रखते၊၊
दिल से,दिमाग से,साँसों से करना हैं इसलिए नमन उनका
वे जीते वक्त मर रहे है, देश के लिए कुरबानी कर
शाहीद बन रहे हैं၊
और हम जी रहे है,,,,,
वे लोग इन्सान नहीं भगवान हैं।
ए कुरबानी, तेरे नाम ही शहीद၊၊