दीपक अनंत राव – नव वर्ष – साप्ताहिक प्रतियोगिता

असीम खुशी से,अती दुःख से, दर्द के चादर पर ओढे, ग़म की गहराईयों पर डूबे, असमंजस के ढ़लान पर भड़के, आस्था के राहों से गुज़रते, अरमानों के नीड़ में बसते, पतझड की निर्जीवता पर कोसते, सुनहरे बसंत ऋतुओं को पुकारते, अपने को खोजकर निकालते,खोते, हर कोई,यहाँ इस पवित्र धरती पर, नववर्ष की राह देख रहे हैं॥ खुशियों को बरकरार रखने, दर्द,गम, दुख मिटाने, एक नयी दुनिया की स्थापना करने, नववर्ष के इन्तज़ार में है၊၊ खोये हुए सपने, नमकीन बन गये आखें, बेराह भड़के भरोसे, तराज़ू पर तोले यारी, मिट गये खून के सौगंघ के भाईचारे, सभी को दुबारा वापस लाने, एक नववर्ष आ रहा है। इस कलयुग में भी कई भले मानुस नव वर्ष के इंतज़ार में है ॥ यह तो एक विशेष तपस्या है सद्‌भावना एक व्यवस्थापित समाज का၊၊ एक धरती,एक आसमान, बीच में पनपती है यहाँ, आदमी की जिन्दगी၊ नये कल के लिए,घायल के लिए, तबाही से उजडे समाज के लिए, बिखरे रिश्तों के लिए,दबे परिवारों के लिए, एक प्रभात आ रहा है, नववर्ष आ रहा हैं इंतज़ार करो, साकार हो जायें हर सपने၊၊