दीपक अनंत राव – पति-पत्नी – साप्ताहिक प्रतियोगिता

दो रिश्ते,यहाँ,पवित्र धरती पर
संपूर्ण हो जाती हैं।
एक ही राह,दोनों के लिए
खुदा सजाती है।
एक बंधन,परिपूरक दो दिलों में
धरती का श्रृंगार नज़राती है၊
दो दिशाएँ एक होकर बहती हैं,
उसमें हज़ारों पीढियाँ पनपती हैं၊
वे चार नज़रों में ही,
शिवर्‍ शक्ति की छवि झलकती၊
पति-पत्नी की सुन्दर संज्ञा से
वे अपने आप सजाती, मनमनाती၊
वह कड़ी,
वह कड़ी केवल लघुता का प्रतीक नहीं,
वह एक बसंत में खिला फूल नहीं,
समंदर तक पहुँचकर, उस पर विलीन होकर
उसकी गहराईयों से
अब भी बहकता नदी का प्रवाह है,
अर्थात अर्धनारीश्वर में एक परिवार है।
वह पति है,
वह पत्नी है,
एक ही बेशक धारा है।
गवाह अग्नि के सामने,
मंत्र-तंत्र द्वारा स्थगित किये
दो अनोखे छोर का अटूटा बन्धन है,
नर नारी अब बन गया पति-पत्नी,,,
वे लक्ष्मी-नारायण थे,,,,
अब नर है हर कही पति नहीं,
नारी है लक्ष्मी है ही नहीं,
परिवार पारावार बन गया,
प्यार के लिए आज वह तरसता जूझता रहा,
दिल की गहराइयों में,
पिंजरे में एक चिडिया,
रो-रोकर सिर पटककर स्वयं मारा၊၊
वह ओर कुच्छ नहीं था,
पारंपरिक सत्ता थी,,,
बदलते आधुनिक परिवेश में
स्मार्ट फॉन पे जीते जीते
पति और पत्नी मर जाते हैं,
माता और पिता मर जाते हैं၊၊
एक औलाद तब,वाट्साप में स्टाटस भर रहा था
कि मैं आज़ाद हो गयी ॥
जीने वाला ही मर सकता है,
ये नहीं जी रहे थे၊
हर पलों में डूब के मर रहे थे।
विज्ञान से ज्ञान अपनाओ
जि़न्दगी का मतलब सीखो ।
पत्नी एक आईना, पति उसकी छाया॥