(दीपक कुमार ‘सूरज’) – बेरोजगारी – साप्ताहिक प्रतियोगिता

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बेरोजगारी की दौर में बस एक रोजगार की तलाश थी,
पढ़ी खूब पुस्तके और तोड़ी ख़ूब कलम थी |
लोगों में सम्मान था ,बड़प्पन का एहसास था |
बेरोजगारी का धब्बा मिटा और हम रोजगार हुए ,
कुछ बड़ा तो नहीं पुलिस में बहाल हुए |
कड़ी प्रशिक्षण के बाद एक नेता के दरवाजें पर तैनात हुए |
नेता १०वीं पास और मैं बी .ए. पास था ,
फ़र्ज की खातिर उसके दरवाजें पर तैनात था |
रोंज आँखों के सामने होता भ्रष्टाचार और अन्याय था ,
जी हजूरी करके होता दिल तार –तार था |
कब तक संभालता अपने आप को ,बहती नदी के धार में ,
ओहदे पर ओहदा मिला ,पहुँच गए भ्रष्टाचार के बाजार में |
भ्रष्टाचार में यू लुप्त हुए अपनों से भी दूर हुए |
ज़मीर अपनी लूट चुकीं थी दौलत की बाजार में ,
अचानक एक दिन बैठ गए पुरानें ख्यालात में |
उन किताबों को लगा निहारने बैठ कर एकांत में ,
जिसने दिया था साथ बेरोजगारी के बाजार में |
हर एक शब्द ने प्रहार किया, दिल का तार-तार किया |
क्यों तुम रोजगार हुए ,इससे अच्छा तो बेरोजगार ही थे |
अपने दरवाजें के शान थे ,समाज के लिए अभिमान थे |
इससे अच्छा तो बेरोजगार थे ,इससे अच्छा बेरोजगार ही थे


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