देवेन्द्र प्रसाद  – देश,नागरिक – साप्ताहिक प्रतियोगिता

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मै हूँ भारत, मैं भारत हूँ

गंगा का निर्मल पानी हूँ
भागीरथ की कहानी हूँ।
मैं सत्कर्मो की गाथा हूँ
मै सबका भाग्य विधाता हूँ।
संतो की कठिन तपस्या हूँ
दुर्जन के लिए समस्या हूँ।
मुझको अंग्रेजो ने लूटा
सदियों से कितनों ने पीटा।
उंगलियां उठी मेरी अस्मत पे
रोया था तब मै किस्मत पे।
पर मेरे वीर जवानों ने
पगड़ी बांधें किसानो ने।
इक दाग नही लगने दिया
कहीं आग नही लगने दिया।
मुझको सीचा है मेहनत से
जोड़ा है अपनी किस्मत से।
मै अब स्वतन्त्र इक काया हूँ
नस नस में सबके समाया हूँ।
मै बच्चों की किलकारी हूँ
बेटी जैसी फुलवारी हूँ।
सिंदूर हूँ मै हर माई का
संघर्ष पिता के कमाई का।
बहना की सच्ची राखी हूँ
मै हर जवान की खाकी हूँ।
सजनी की चुड़ी कंगन हूँ
मै सहज प्रेम, अभिनन्दन हूँ।
अब तो मै इक इक कतरा हूँ
सबकी मुस्कान में बिखरा हूँ।
सब नाते रिश्तेदार हूं मै
दुश्मन के लिए प्रहार हूँ मै।
मै नशा हूँ गौरव पाने का
मै हूँ किताब लिख जाने का।
मै यहां का हर निवासी हूँ
मै ही तो भारतवासी हूँ।
मै हूँ तो सबकी शान है
मुझमें ही सबकी जान है।
मै गीता हूँ, कुरान हूँ मै
समझो तो इक भगवान हूँ मै।
मै हर तीरथ, हर धाम हूँ
मै कड़ी धुप, मै शाम हूँ।
हर रुह यहां, शरीर भी मै
सब लोगों की तकदीर भी मै।

मै क्या हूँ? कितना बतलांऊ?
मै सब हूँ, क्या क्या दिखलांऊ?
मै सभी नव्य पदारथ हूँ
मै हूँ भारत, मै भारत हूँ।


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