नेहरू इंदिरा रहे नाकाम, क्या PM Modi बनाएंगे भारत को P-6?

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संयुक्त राष्ट्र आम सभा को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (फाइल फोटो)

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आए संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की सुरक्षा परिषद में दुनिया के 5 कद्दावर देश अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और यूनाइटेड किंगडम को जगह मिली. इन देशों को पी-5 (Permanent Five) भी कहा जाता है. भारत लंबे समय से इस एलीट क्लब में शामिल होने की जद्दोजहद कर रहा है. तकनीकी रूप से उसकी दावेदारी बनती भी है और पी-5 के ही ज्यादातर देश खुलेआम इसे स्वीकार भी चुके हैं. सवाल उठ रहा है कि क्या मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां भारत को सुरक्षा परिषद में बतौर पी-6 शामिल करने के सबसे मुफीद हैं?

बीते कई दशकों से दुनियाभर में सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग चल रही है और इस दौड़ में भारत सबसे आगे है. आजादी से पहले ही भारत ने बतौर फाउंडिंग मेंबर 1 जनवरी 1942 को संयुक्त राष्ट्र को  अस्तित्व में लाने के लिए वॉशिंगटन डेक्लरेशन पर हस्ताक्षर किए और विश्व शांति के सभी प्रयासों में अहम भूमिका अदा करने की सहमति दी. संयुक्त राष्ट्र में भारत के पहले प्रतिनिधि सर ए रामास्वामी मुदलियार थे.

मौजूदा पी-5 सदस्य आर्थिक और सैन्य शक्ति होने के साथ-साथ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित होने वाली दुनिया के ऐसे देश थे जिन्हें संयुक्त राष्ट्र ने तीसरे विश्व युद्ध की संभावनाओं को खत्म करने की जिम्मेदारी दी. संयुक्त राष्ट्र के निर्माण के वक्त चीन को छोड़कर चारों देश द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता समूह में थे और बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति होने के कारण इन्होंने विश्व शांति को स्थापित करने में अपनी अहम सक्रियता निर्धारित की.

आजादी के बाद पहली बार भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य 1950-51 में बना. सुरक्षा परिषद में पी-5 के अलावा 10 अस्थायी सदस्य हैं और सदस्य देश दो वर्षों के लिए इनका चुनाव करते हैं. आजादी के तीन साल बाद ही अस्थायी सदस्य बना भारत अबतक 7 बार सुरक्षा परिषद में शामिल हो चुका है (1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12).


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