पवन गौतम – जवान/फौजी/सैनिक – साप्ताहिक प्रतियोगिता

आज हिमालय की छाती
की पीर सुनाने आया हूँ !
फिर से निकले कोई गंगा
नीर बहाने आया हूँ !
लैला को मजनूं रांझा से
हीर मिलाने आया हूँ !
खण्ड खण्ड भारत की मैं
तस्वीर दिखाने आया हूँ !

फिर अखण्ड होगा कर रक्तिम निर्झर…

अमर हुआ बलिदान राष्ट्र की बने धरोहर।

अब ना कोई चन्दरशेखर
ओर ना राजगुरू होगा !
यवनो से लडने वाला ना
झेलम वीर पुरू होगा !
जौहर के त्योहार तो जैसे
नानी की बातें होगी !
आलम अंधकार का कायम
हाँ ! काली राते होंगी !

गर सरहद पर फिर से सैनिक लड़े झपटकर…

अमर हुआ बलिदान राष्ट्र की बने धरोहर।

राजनीति वाचाल हो गई
नेता हुए खूब मक्कार !
छीना झपटी हाथापाई
और संसद हैै शर्मोसार !
क्या गाँधी ने इसीलिए
थी खाई अंग्रेजों की मार !
बालतिलक ने माँगा था क्या
ऐसा जन्म सिद्ध अधिकार !

ऐसा ही होगा गर शहीद को रहे भूलकर…

अमर हुआ बलिदान राष्ट्र की बने धरोहर।

हत्या चोरी और डकेती
जाति धर्म वाला भूचाल !
किसने डाला दूध में खट्टेपन
का चुपके से कूचाल !
एक और रोटी के लाले
उस पाले में मालामाल ।
भूख मिटाने की मजबूरी
हवस भेडिए बने दलाल ।

वो गौरव के लिए मिटे फाँसी में झूलकर…

अमर हुआ बलिदान राष्ट्र की बने धरोहर।

राष्ट्रीय चिह्नो की स्थिति

‘हॉकी’ हारी ‘मोर’ तडपता
‘बाघ’ भागता जंगल से !
गुमसुम है मासूम ‘तिरंगा’
मंगल चिह्न अमंगल से !
‘कमल’ महकना छोड़ चुका है
‘राजभवन’ है दंगल से !
‘राष्ट्रगीत’ और ‘राष्ट्रगान’ अब
गाये जाते जिंगल से !

जो थे बीज मिटे बन मीठे तरवर…
अमर हुआ बलिदान राष्ट्र की बने धरोहर।