प्रवासी – पदमा तिवारी दमोह

क्या कहूं दर्द है कितना
प्रवासियों को देखा नहीं जाता
हो रहा वापस शहर से गांव
वह तो बैठ कर रो भी नहीं पाता।।

कितनी स्थिति गंभीर है
देख रहे इनकी तस्वीरें
इतनी कड़ी धूप में चल रहे
कैसी इनकी तकदीरें।।

सिर पर रख सामान
दोनों हाथों से बच्चों को पकड़े
पीछे पत्नी पैदल चलती
देखकर होते दिल के टुकड़े टुकड़े।।

कैसी आपदा ये आई है
छिन गई प्रवासियों की रोजी रोटी
गांव से गए थे शहर कमाने
वह भी छिन गई 2 जून रोटी।।

शरीर पसीने से लथपथ
पैरों में पड़ गए हैं छाले
नहीं है पहनने को चप्पल
प्रवासी हूं मुंह पर पड़े हैं ताले।।

नवजात शिशु को बांध पीठ पर
चल रही अबला नारी हूं
दूध तो क्या नहीं मिल रहा पानी
हालातों कि मैं मारी हूं।।

पदमा ओजेंद्र तिवारी दमोह मध्य प्रदेश मो.9630856049,9131470428
@ सर्वाधिकार सुरक्षित/ यह रचना मौलिक और स्वरचित है।