फागुन का महीना – इन्दिरा कुमारी

फागुन का महीना

फागुनी बयार आज बहने लगी
हो प्रफुल्लित प्रकृति सॅवरने लगी।

फागुन का महीना मौसम सुहाना
आगमन वसंत का स्वागत में गाना
कुहू कुहू गीत कोकिल गाने लगी
झूम झूम कली मुस्कुराने लगी
फागुनी बयार आज बहने लगी
हो प्रफुल्लित प्रकृति सॅवरने लगी।

बहती फागुनी बसंती बयार
होकर रोमांचित निखरती बहार
संग रंग बिरंग पुष्प पीयर खिलने लगा
मंजरित हो आम्रवृक्ष महकने लगा
फागुनी बयार आज बहने लगी
हो प्रफुल्लित प्रकृति सॅवरने लगी।

लाती बसंती फागुन का रंग
कोमल हृदय में भरती उमंग
यौवन तरंग संग उमरने लगा
मधुर मिलन को मचलने लगा
फागुनी बयार आज बहने लगी
हो प्रफुल्लित प्रकृति सॅवरने लगी।

है यह प्रकृति का प्राकृतिक नियम
तोड़ नियम इसका हुआ कृत्रिम जीवन
हो मन संवेदनहीन भटकने लगा
असंतोष अशांति में गुमने लगा
फागुनी बयार आज बहने लगी
हो प्रफुल्लित प्रकृति सॅवरने लगी।

सुन री बहकती बसंती बयार
छेड़ दे तू सरगम हो संवेदनशील प्यार
अब दिल में वो हलचल मचलने लगी
प्रिय को प्रिया याद आने लगी
फागुनी बयार आज बहने लगी
हो प्रफुल्लित प्रकृति सॅवरने लगी।

फागुन का महीना लिया नींद चैन
नयन प्रिया का मिलने को बेचैन
धुन फागुन की दिल में बजने लगी
गुलाल संग फाग प्रिया गाने लगी
फागुनी बयार आज बहने लगी
हो प्रफुल्लित प्रकृति सॅवरने लगी।

फागुन का महीना की है यही महिमा
भरती रंग जीवन में है मर्यादा बचाना
प्रिय मारो पिचकारी ,होली मचने लगी
प्रीत के रंग में प्रिया रंगने लगी
फागुनी बयार आज बहने लगी
हो प्रफुल्लित प्रकृति सॅवरने लगी।