फागुन की मदमस्त बहार में – गोविन्द सिंह राव

इश्क के तेरे रंग में रंग कर,
जीवन का हर तार पुकारे।
प्रीत की रीत में खोने को अब,
मेरा सब संसार पुकारे।

  फागुन की मदमस्त बहार में,
  सजनी तुझको प्यार पुकारे।

फूलों पर मधुमास हैं छाया,
देखो कलियां चटक रही हैं ।
बासंती इस रुत में गोरी,
दिल की हर झंकार पुकारे।

  फागुन की मदमस्त बहार में,
  सजनी तुझको प्यार पुकारे।

नस नस में उफान भरा है,
अल्हड़ तेरी जवानी का।
बासंती रजनी में सजनी,
बाहों का तुझे हार पुकारे।

   फागुन की मदमस्त बहार में,
   सजनी तुझको प्यार पुकारे।

कोयल छेड़े तान मधुर जब ,
पपीहा पीव की टेर करे।
दिल की सांसों को झंकृत कर,
फागुन की सुरताल पुकारे।

   फागुन की मदमस्त बहार में,
   सजनी तुझको प्यार पुकारे।

मदिर मदिर ये पवन बहे जब ,
छूकर तेरे कपोलो को,
मस्त बयार ये भड़काती है,
दिल के मेरे शोलो को ।

   फागुन की मदमस्त बहार में,
   सजनी तुझको प्यार पुकारे।