फिर से कालाहांडी ने एक दर्दनाक मंज़र देखा

( “कालाहांडी (उड़ीसा) में धन अभाव के कारण सरकारी मदद न मिलने से एक आदमी अपनी पत्नी की लाश को 12 किलोमीटर तक कन्धे पे ले गया” उसके हौसले को सलाम करती और राजनीती को धिक्कारती कवि मयंक शर्मा की नयी रचना)

फिर से कालाहांडी ने एक दर्दनाक मंज़र देखा
मानवता की छाती पे एक घुसा हुआ खंजर देखा

धन अभाव में लाश को ले जाने को वाहन नहीं दिया
साधनहीन की लाज बचाने कोई साधन नहीं दिया

नमन तुझे ऐ मानव तूने क्या साहस दिखलाया है
बीवी के शव को कंधे पर मीलों लेकर आया है

क्या होता है नारी का सम्मान बताया है तूने
भारत में रिश्तों का पावन मर्म दिखाया है तूने

जीवनसाथी से रिश्तों का नया अर्थ दिखला डाला
मर्द के कंधे क्या होते है दुनिया को बतला डाला

आज़ादी के सत्तर सालो बाद अगर ये होना है
अस्पताल से घर तक लाशों को कंधे पर ढोना है

सरकारों को कंधा देकर शमशानों तक ले जाओ
संसद के सारे विधान पे आग लगा कर आ जाओ

जो सरकारें मानव की पीढ़ा तक पहुँच न पाती है
इक दिन ऐसी सरकारों की खुद अर्थी उठ जाती है

सरकारी सिस्टम जब जब भी जनता को तड़पाता है
सारा सिस्टम इक दिन खुद भी तड़प तड़प मर जाता है

जगन्नाथ जब साथ खड़े हैं निर्बल भी तन जाते हैं
कोई साथ न आये तो वो खुद कंधा बन जाते हैं.

कवि – मयंक शर्मा