बसंत प्रेम का महीना – बजरंग लाल सैनी वज्रघन

बसंत प्रेम का महीना
गंध समीर,
मंद-मंद मलय,
विश्रांत तन।

शीतल हवा,
सुरधनु निखरे,
रंग-बिरंगे ।

मधुर रव,
सरिता कलकल,
मन प्रसन्न।

कोकिला कूजी,
कर्णपट झंकृत,
आनंद मग्न।

रक्तिम नभ,
कृष्ण मेघाग्र वक,
शुभ्र धवल।

संध्या समय,
नीड़ सम्मुख खग,
कलह रत।

सुंदर खग,
करते कलरल,
अद्भुत दृश्य।

बतलाते हों,
आपबीती दिन की,
मोद भाव से।

झाँक नीड़ों से,
ताक रहे चूज़े हैं,
हैरत भरे।

पत्तों से ज्यादा,
पक्षी हैं डालों पर,
गिन लो चाहे।