भटकती लाश

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देख रहे थे खडे शिखंडी , आसमान रोया होगा ।
बारह वर्ष की उस बेटी का , अन्तर्मन रोया होगा।।
चली पिता के पीछे बेटी, यहां लाशों की मंडी है ।
इसे देखकर लगता है अब सारा दौर शिखंडी है ।।
एक तरफ थी जिंदा लाशें, खडी तमासा देख रही।
कांधे वाली लाश हांफकर , आगे मारग पूछ रही ।।
शासन ने भी बेशर्मी से , कैसे पल्ला झाड दिया ।
मरी लाश का कुछ लोगों ने , कैसे सीना फाड दिया ।।
लोकतंत्र की अर्थी लेकर , दाना चल दिया पैरों पर ।
कोई फर्क नहीं पडता यहां, चारों ओर लुटेरों पर।।
( विजय सिंह यादव, कवि एवम कथाकार)


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