भारत की जेलों में बंद हैं 200 रोहिंग्या, जल्द वापस भेजेगी सरकार

भारत ने 7 रोहिंग्या घुसपैठियों को उनके वतन म्यांमार वापस भेज दिया है. ये सभी रोहिंग्या भारत में कई वर्ष से अवैध रूप से रह रहे थे. म्यांमार के अधिकारियों ने इनकी नागरिकता पुष्ट कर दी, जिसके बाद इन्हें वापस भेजने की कार्रवाई शुरू हुई.

म्यांमार के रखाइन प्रांत में बौद्ध और रोहिंग्या के बीच हुई हिंसा के बाद रोहिंग्याओं का एक बड़ा समूह म्यांमार छोड़कर अन्य देशों में चला गया. एक अनुमान के मुताबिक, तकरीबन 40 हजार रोहिंग्या फिलहाल भारत में रह रहे हैं. जिन 7 लोगों को वापस भेजा जा रहा है, उन्हें साल 2012 में गिरफ्तार किया गया था. तब से वे असम के सिलचर में जेल में बंद थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भारत सरकार रोहिंग्या लोगों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बता चुकी है और उन्हें वापस म्यांमार भेजने का फैसला काफी पहले कर चुकी है. पिछले साल ऐसे घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें प्रत्यर्पित करने के आदेश दिए गए थे.

असम के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक भास्कर ज्योति महंता ने रॉयटर्स को बताया कि घुसपैठियों को वापस भेजने का सिलसिला अक्सर चलता रहता है और पहले भी लोगों को भेजा गया है. हालांकि संयुक्त राष्ट्र के एक मानवाधिकार अधिकारी ने 7 रोहिंग्याओं को जबरन वापस भेजने की कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया है.

संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों की मानें तो 7 लाख से ज्यादा रोहिंग्या रखाइन प्रांत छोड़कर पड़ोसी देश बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं. इनके भागने के पीछे म्यांमार में फैली हिंसा और मजहबी भेदभाव को कारण बताया जाता है. संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी रोहिंग्या के खिलाफ म्यांमार आर्मी की कार्रवाई को जातीय संहार बताया है. हालांकि म्यांमार इन आरोपों को खारिज कर चुका है और उसका कहना है कि आर्मी ने कार्रवाई तब की जब सेना के खिलाफ हिंसक हमले किए गए.