भारत-चीन मुलाकातः छंटने लगी धूल, जागने लगी उम्मीद

अंतरराष्ट्रीय मेल-मुलाकातों की सफलता के निष्कर्ष तक पहुंचना पेचीदा काम है. ‘चीन के सबसे खुशहाल’ शहर में हुए भारत-चीनशिखर ‘अनौपचारिक’ सम्मेलन की धूल छंटने लगी है और कुछ ऐसी वजहें उभरी हैं जिसमें आशा की कुछ किरणें फूटती देखी जा सकती हैं.

दो पड़ोसी देशों के बीच संबंधों में पिछले एक साल से लगातार गिरावट आ रही थी, खासतौर से 73 दिनों तक डोकलाम की तनातनी के बाद तो रिश्ते तल्खी की हदों तक पहुंच गए थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को इसका श्रेय जाना चाहिए कि रसातल की ओर जाते पारस्परिक संबंधों को उन्होंने सहारा देकर संभालने की कोशिश की. जैसा कि शी ने मोदी को चाय पर बताया भी कि वे यह संदेश देना चाहते थे कि ”उनके लिए यह संबंध कितनी अहमियत रखता है.”

चीन के राष्ट्रपति शी किसी देश के राजनेता की अगुआई के लिए राजधानी बीजिंग से बाहर तक सिर्फ दो ही बार गए हैं और दोनों ही बार वे मोदी की अगुआई करने आए हैं. वुहान, जैसा कि इस पत्रिका के पिछले हफ्ते यानी 9 मई के अंक की रिपोर्ट में बताया भी गया था कि बातचीत से पहले मुद्दे तय नहीं थे और न ही इसमें न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत की एंट्री या फिर चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर जैसे विषय उठाए जाने थे जिसको लेकर दोनों देश असहज हो जाते हैं. इस सम्मेलन की सफलता का यही कारण रहा.

इस गर्मजोशी को बरकरार रख पाना एक चुनौतीपूर्ण काम होगा खासकर तब जबकि भारत में चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. चीन भी कोरियाई प्रायद्वीप की तेजी से बदलती सूरतेहाल में कोरियाई देश अमेरिका के साथ गलबहियां को तैयार हैं और चीन की स्थिति एक मूकदर्शक भर की रह गई है.

दोनों ही पक्ष चुनौतियों से अच्छी तरह परिचित हैं. इसलिए वुहान के बाद कोशिश होगी कुछ ठोस करने की, जिसकी शुरुआत 3,488 किलोमीटर लंबी सीमाओं से हो सकती है. विदेश सचिव विजय गोखले ने बताया कि मोदी और शी ने अपनी सेनाओं के लिए आपसी संपर्क बरकरार रखने और सीमा से जुड़े मुद्दों के प्रबंधन में वृद्धि को लेकर कुछ ‘रणनीतिक दिशा-निर्देश’ तैयार किए हैं. दोनों देशों के सेना मुख्यालयों के बीच संपर्क के लिए जल्द ही हॉटलाइन शुरू हो जाएगी.

जिन महत्वाकांक्षी प्रस्तावों पर चर्चा हुई उनमें से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित 16 क्षेत्रों को लेकर विवाद बहुत अहम है क्योंकि दोनों देशों के बीच सीमाक्षेत्रों को लेकर बहुत अस्पष्टता है. पश्चिमी सेक्टर में चुमार और डेमचोक क्षेत्र को लेकर पहले भी तनातनी हो चुकी है और पूर्वी सेक्टर में समदुरोंग चू तथा लोंगजू के इलाकों को दोनों देश अपना-अपना इलाका बताते हैं.

बीजिंग में चीन के रणनीतिक विशेषज्ञ हु शिशेंग कहते हैं, ”यह उत्साहवर्धक कदम है. जहां सीमारेखा स्पष्ट नहीं है वहां अक्सर तनाव पैदा हो जाया करता है. दोनों के बीच पिछले कई सालों से आपसी संबंधों में खटास पैदा होने का यही कारण रहा है.”

हू का मानना है, ”16 स्थानों को लेकर जो समझ बनेगी उससे वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर भी सहमति बननी शुरू हो जाएगी. यह सीमा विवादों को दूर करने की दिशा में वास्तव में एक अभूतपूर्व प्रयास है.”

दूसरी बड़ी सफलता तीसरे देश में संयुक्त रूप से आर्थिक परियोजनाओं को बढ़ाना हो सकती है. मोदी और शी ने अफगानिस्तान से इसकी शुरुआत करने का विचार दिया. चीन के उप-विदेश मंत्री कोंग शुआनयू ने बताया कि चीन-भारत प्लस वन या चीन-भारत प्लस एक्स के रूप में एक नीतिगत समन्वय बनाने जैसे मुद्दे पर भी बात हुई.

उन्होंने बताया कि दोनों देश तो चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) पर भी मतभेदों को अनदेखा करने को तैयार हैं क्योंकि भारत ने कह दिया कि वह चीन के महत्वाकांक्षी अभियान सीपीईसी प्रोजेक्ट के प्रति अपना विरोध नहीं छोड़ सकता क्योंकि सड़क पाक-अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरती है.

यहां दोनों देश थोड़ा-थोड़ा झुकते दिखेः चीन आपसी आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए अब भारत के सामने बीआरआइ को समर्थन देने जैसी पूर्व शर्त नहीं रखेगा और भारत भी पुरानी बातें भुलाकर पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में खुले दिल से सहयोग करेगा.

कोंग ने कहा, ”भारत बेल्ट ऐंड रोड पहल स्वीकार करता है या नहीं करता है, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है. कोई अगर किसी काम को नहीं करना चाहता तो उस पर वह काम थोपा नहीं जाना चाहिए.” वुहान में खुले मन से वार्ता हुई और यह छोटी बात नहीं. लेकिन अब बातों को धरातल पर उतारने की असली चुनौतियां सामने होंगी.