मनित कुमार मीणा – जन्म मृत्यु – साप्ताहिक प्रतियोगिता

जन्म-मृत्यु आपस मे बंधी एक अटूट डोर हैं , जन्म आदि हैं तो मृत्यु जीवन का अन्त है । मृत्यु से ही जीवन खूबसूरत हैं । संसार तो बस एक रंगमंच हैं , जहाँ आदमी चंद लम्हो का मेहमान हैं , जन्म-मृत्यु तो विधाता का खेल हैं , यहाँ जन्म दे दिया तो मृत्यु भी अटल हैं । हमें तो बस यहाँ आना है , अपनी भूमिका निभाना हैं , और फिर ….. बस चले जाना है । जन्म के रंग अनेक हैं , पर मृत्यु का कोई रंग ,आकार नही है , जब चाहा साथ ले जाती हैं । इंसान तूने भी कैसा जन्म लिया है , सब कुछ पाकर भी कुछ नही तेरे पास है , न तू खुश है न तू आबाद हैं । जी कर तो क्या ,मर कर भी तुझे चैन नही हैं जीता तब सारी जिंदगी धन-दौलत की भागदौड़ में रहता हैं , और जब मरता हैं तो ऐसे …… मानो की यहाँ तेरा कुछ नही है । इंसान तू खुद को सजाने में व्यस्त है और मृत्यु तुझे निवर्स्त्र करने की तैयारी में है । हे इंसान , एक सिकन्दर तेरा भाई ….. सबकुछ जीत कर भी खाली हाथ गया हैं । तू हथियार जमा करने में मशगुल हैं और उधर मौत तुझे निहत्था करने की फ़िराक़ में है । छोटे से जीवन मे तू छल-कपट खेलता हैं, और मौत तेरी इस नादानी पर हँसती हैं । जन्म लेकर भी हर किसी ने अपनी आदमियत , इंसानियत को ही खोया है , फिर भला क्या जन्म लिया है । उन्नाव,डॉ. रेड्डी , निर्भया …….ये तेरी इंसानियत के कैसे उदाहरण हैं , जिंदा हैं तू पर तेरी रुह-ए -आदमियत मर चुकी हैं । मौत से ज्यादा अफसोस तेरे जीवन पर है । सारा जीवन बस यूँ ही स्वार्थ की भागदौड़ में बिताया हैं , फिर क्या जिक्र तेरे जन्म का हैं , क्या बखान तेरी मौत का हैं ।।।