मनित कुमार मीणा – पति-पत्नी – साप्ताहिक प्रतियोगिता

पति काज़ी तो पत्नी मस्जिद हैं , पत्नी मन्दिर तो पति पुजारी हैं , एक – दूसरे के बिना दोनों की कहानी अधूरी हैं । पत्नी हज़ हैं पर पति भी तो जायरीन हैं , पति ज़ामिन हैं पर पत्नी भी तो ज़ियारत हैं । एक हैड हैं तो एक टैल हैं , दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं । एक-दूसरे के जीवन की पहचान हैं , तभी तो दो जिस्म एक जान हैं । यही तो रिश्ता हैं जिसमें प्यार कम तक़रार ज्यादा है , पर मिठास फिर भी कमाल हैं । पत्नी से रिश्ता भी तो ऐसा है कि, हर चीज़ में ख़्याल भी उसी का हैं । पत्नी मेरे आंगन का सवेरा हैं, या ये कहुँ कि मेरे जीवन का आफ़ताब हैं । पत्नी भी कितनी अजब-गज़ब ,बेमिसाल हैं , बीमार मैं हूँ,परेसान वो हैं , दिक्कत में मैं हूँ पर हलचल में वो हैं, भागदौड़ में मैं हूँ पर थकान में वो हैं । मन्दिर आना-जाना उसका हैं पर दुआ मेरी है , इबादत उसकी हैं पर जिक्र मेरा हैं , राजी मैं हु पर रोज़े में वो हैं । आपस की लड़ाई हो तो भी एक-दूसरे को मना ही लेते हैं , कुछ इस तरह दोनों मिलकर जिंदगी को आसान कर लेते है । पत्नी परेसान भले की करती हैं पर साथ देती हैं तो यमराज से भी लड़ जाती हैं । सुख-दुख में हम साथ हैं, इस जन्म ही नही ………. सात जन्म हम साथ हैं । मैं तुझमें ,तू मुझमें हैं , मैं शिल्पकार , तू मेरी मूरत हैं , कितनी नायाब ये ख़ुदा की कारीगरी हैं। मेरे हमसफ़र जब भी तुझे देखता हूँ तो लगता हैं …….. तू हमदर्द मेरे हर ग़मगुस्सार का हैं ।।।।।।।।