महाराष्ट्रः चकाचक मुंबई पर मचने लगी चखचख

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की मुंबई के ईस्ट कोस्ट की 34 एकड़ जमीन पर अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा और मनोरंजन हब बनाने की पेशकश को लेकर जोरदार आंदोलन शुरू हो गया है. इस योजना के लिए कोलाबा से वडाला और उससे भी आगे तक फैली मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (एमबीपीटी) की मिल्कियत वाली जमीन को खाली करवाना होगा, जिससे यहां किराए पर रह रहे बाशिंदों और इस्पात व्यापारियों सहित कोई 2 लाख लोग विस्थापित होंगे. उन्होंने सरकार का विरोध करने के लिए अब अरसे से बेजान पड़ी मुंबई पोर्ट ट्रस्ट टेनेंट्स एसोसिएशन को फिर जिंदा कर लिया है.

एमबीपीटी ने यहां के बाशिंदों और कारोबारियों को कई नोटिस जारी किए थे और कहा था कि वे 2012 में सुप्रीम कोर्ट की संशोधित दर के मुताबिक किराया अदा करें. यह 1942 में कोई 2,200 लोगों के लिए 5 रुपए प्रति वर्ग मीटर सालाना की दी गई दर से काफी ज्यादा है. कई मूल किरायेदारों ने इतने सालों के दौरान जमीन या तो गैर-कानूनी तौर पर बेच दी या सबलेट कर दी है.

मुश्किल 2014 में शुरू हुई जब गडकरी ने ऐलान किया कि नया हब ईस्ट कोस्ट पर एमबीपीटी की जमीन पर बनेगा. योजना के मुताबिक धुर दक्षिण में कोलाबा के किरायेदार अगर संशोधित किराया, जो अभी तय भी नहीं हुआ है, अदा करने को राजी हो जाते हैं, तो उन्हें बेदखल नहीं किया जाएगा.

मगर बीच का हिस्सा—दारूखाना—जो प्रस्तावित विकास योजना के लिए सबसे अहम है, पूरी तरह खाली करवाया जाना है. 31 मार्च को एमबीपीटी ने किराया जमा नहीं करवाने के लिए एक इमारत को सील कर दिया, जहां कोई 80 कारोबारी काम कर रहे थे.

दारूखाना आयरन ऐंड स्टील एसोसिएशन के मुखिया राजीव खंडेलवाल कहते हैं कि इस बेदखली से हजारों नौकरियां जाएंगी. दारूखाना के व्यापारी इंडोनेशिया और चीन से इस्पात के आयात पर हर महीने औसतन 50 करोड़ रुपए जीएसटी का योगदान देते हैं. खंडेलवाल का आरोप है कि एमबीपीटी केवल गडकरी की भव्य योजना की वजह से हरकत में आई है.

हालांकि ट्रस्ट के एक शीर्ष अफसर बताते हैं कि ये लीज शुरुआत में एक से 15 महीनों के लिए दी गई थीं, जिनका बाद में कोई नवीकरण नहीं हुआ. कब्जे को गैर-कानूनी ठहराते हुए वे यह भी कहते हैं कि लीज के दस्तावेजों में नवीकरण का प्रावधान ही नहीं है.

दारूखाना के लिए गडकरी की योजना में सिलसिलेवार गोदाम भी शामिल हैं, जहां सीधे जवाहरलाल नेहरू पोर्ट से माल आएगा. इससे उन 200 ट्रॉलरों और 1,200 ट्रकों की मौजूदा आवाजाही घटकर आधी रह जाएगी. एमबीपीटी ने कारोबारों को नए सिरे से बसाने के लिए वैकल्पिक जगह की पेशकश की है.

मगर दारूखाना के इस्पात व्यापारियों ने न केवल यह पेशकश ठुकरा दी है, बल्कि शिकायत कर रहे हैं कि अधिकारी चुनिंदा ढंग से पेश आ रहे हैं और गडकरी के मंत्रालय से अभी अनिवार्य मंजूरियां भी नहीं आ रही हैं.

एक व्यापारी अरशद अली खान ‘नाइंसाफी’ की शिकायत करते हैं. वे कहते हैं कि सरकार एक तरफ तो झुग्गियों के बाशिंदों के पुनर्वास पर करोड़ों खर्च कर रही है, दूसरी तरफ  जायज कारोबारों को उनकी जमीन से उखाड़ रही है. वे सवाल करते हैं, ”क्या हमारी गलती यह है कि हम झुग्गियों में नहीं रहते?”

एमबीपीटी के अफसर अपनी बेरुखी की बात पर कंधा झटकते देते हैं. वे कहते हैं, ”झुग्गियों का पुनर्वास राष्ट्रीय नीति है.” विरोध तेजी पकड़ रहा है और ईस्ट कोस्ट के कायापलट का गडकरी का वादा अब भी सुदूर सपना ही बना हुआ है. ऐसे में गडकरी चीजों को आगे बढ़ाने के लिए आमादा हैं. वे अगले साल चुनाव से पहले इस परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए बेताब हैं.