महीना फागुन और दिल प्या‌र भरा – दीपक अनंत राव “अंशुमान”

नज़ारों में जीना,नज़ाकतों में बहना
आदमी हर पल चाहता है
तभी वो ज़िन्दगी में खुशियों से पलती है
तभी वो सपनों का आज़मायिश भी महसूसते
आदमी अपनी इरादों से
गुज़रे हुए कल की नाकामयाबी को
सार्थक बना देती है
बिखरे हुए सपनों में कभी वो भडकता भी है
चट्ठानों की दुनिया में हल्का सा दिल लेकर
इसलिए कोई न कोई उसके जीवन में होना ज़रूरी है
काँच के पीछे धुंधले रोशनी के उस छोर पर बत्ती
आराम से अपने को स्वयं भूलकर जलते रहते
काँच को साफ करा के उस रोशनी की जादूई झडी को दिखानें के लिए कोई कोई चाहिए उसे
इस अनंत एवं विराट प्रकृति में
अब मौसम सुहावना है फागुन है
कुच्छ करने दिखाना है हर किसी को
कुछ अपनाकर प्यार में झूम उढ़ना भी
बाहर अभी ठंठ नहीं,गरमी आपको तपती नहीं
मिलने में मिलाने में मज़ा तो है,
मिट्टी का पुत्तर भी सपने देखते
पनपे हुए अनाज के लिए ईश्वर का गुणगान भी गाते
उस पेड की डाली पर बैठकर चिडिया
तब भी गाना गा रही है
हर कही सुंदर ही सुंदर नज़ारे यह मौसम ओर कुछ नहीं बल्कि फागुन ही फागुन हैं
कही से नज़रों पर लालिमा बिझाते हुए
आ गये रंगों का त्योहार होली भी
पिचकारियों से भीग गये रंगेन सपने
सभी के दिलों में छा जाते
चारों तरफ खुशी ही खुशी
खुशहाली ही खुशहाली
मौसम ओर कुछ नहीं हैं
महीना फागुन और दिल प्यार भरा ॥