मेघना रॉय – जवान/फौजी/सैनिक – साप्ताहिक प्रतियोगिता

निस्तब्ध निशा के शीत पवन मे,
घने तिमिर के दिशा पुलिन मे,
तारों की मलिन ज्योति मे,
बढ़ते रहते अविरल पग।

शुभ्र हिमाचल की काया में,
चन्द्र किरण शीतल छाया में,
निर्जन पथ के सूने पन मे,
बढ़ते रहते अविरल पग।

बिखरे अमृत मकरंद मध्य मे,
लेकर तीव्र व्यथा अति उर मे,
सुप्त लोक स्वप्निल पलकों पे,
बढ़ते रहते अविरल पग।

अप्रतिम प्रकृति के अवगुंठन मे,
मिलन आशा की क्षीण रेख मे,
गीत राग के मादक लय मे,
बढ़ते रहते अविरल पग।

छिटके पंखुड़ियों के कुंजों मे,
विजय कंचन के आकर्षण मे,
हिमाद्रि तुंग उत्तुंग शिखर पर,
बर्फ शिला पर बढ़ते पग,
बढ़ते रहते अविरल पग।

तपी धरा जब ग्रीष्म ऋतु में,
क्षुधा-सुधा को तुम भुलाए,
भरी दोपहरी तप्त दिवा मे,
मरुभूमि पर बढ़ते पग,
बढ़ते रहते अविरल पग।

हे भारत माँ के अमर जवान,
वीर सपूत तुम सैनिक महान,
रोम-रोम करता अभिनंदन,
शतशत नमन है तुमको वंदन,
अपराजित अस्त्र लिए,
बढ़ते रहते अविरल पग।।