युद्धरत औरत

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सुबह सवेरे

एक बनावटी मुस्कान पहने निकलती है घर से

बार-बार मुखौटे बदलते थक जाती है

कृत्रिम हंसी, खुश्क आंखें और खोखले मन

आतंकित करते हैं

तब भी विशिष्टों में नहीं रच पच पाती

थकी हुई वापस लौटती है अपनी दुनिया में

जहां राह देख रहे हैं

जाने कब से भूखे बच्चे,

बिखरा घर, उलझी आलमारी

दूध राशन सब्जी की खरीदारी

करती युद्धरत औरत

डांट डपटकर सुला देती है बच्चों को

पड़ जाती है निढाल बिस्तर पर

ताकि कल फिर जिरहबख्तर के साथ

निकल सके घर से।

 

डॉ. सुधा उपाध्याय


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