रंग – इन्दिरा कुमारी

आओ सखी तुझे रंग लगा दूं
स्नेह घोल तुझे भंग पिला दूं।

इस रंग की महिमा अजब है
प्रकृति में संगम गज़ब है
इससे अब परिचित करा दूं
आओ सखी तुझे रंग लगा दूं
स्नेह घोल अब भंग पिला दूं।

लाल गुलाल नील हरा पीला
हिल मिल कर सब बनत है काला
नाम यही अब गुण पहचानू
आओ सखी तुझे रंग लगा दूं
स्नेह घोल अब भंग पिला दूं।

रंग पर्व के बीच भँवर में
पिया मिलन के शुभ अवसर में
लाल लगाय मैं पिया मन भाऊं
पियरी से मैं प्रीत जगा दूं
आओ सखी तुझे रंग लगा दूं
स्नेह घोल अब भंग पिला दूं।

हरे रंग की गाथा वृहत है
काले नीले की कथा अनंत है
हरा लगाय मैं छम छम नांचूं
नीले से मैं गगन को चूमूं
आओ सखी तुझे रंग लगा दूं
स्नेह घोल अब भंग पिला दूं।

देखो सखी तुम भूल न जाना
कारी लगाय तुम मत पछताना
आओ इसका गुण समझा दूं
इसे लगाय तेरी नज़र उतारुं
आओ सखी तुझे रंग लगा दूं
स्नेह घोल अब भंग पिला दूं।

रंग बिना तो जग है सूना
स्नेह बिना क्या जीवन जीना
आओ सखी तुझे नेह जगा दूं
स्नेह घोल तुझे भंग पिला दूं
आओ सखी तुझे रंग लगा दूं
स्नेह घोल अब भंग पिला दूं।