रश्मि शाह – जन्म मृत्यु – साप्ताहिक प्रतियोगिता

मानव है कठपुतली मेल काठ और धागों का, खेलता विधाता जिससे, खेल ये जन्म मृत्यु का ।। विभिन्न योनियों में ले जन्म, भटकता है जीव जब तक ना मेल हो आत्मा से परमात्मा का माया के बंधन में बंधना बंध-बंध कर फिर तड़पना, खेल है यह सिर्फ और सिर्फ पंछी और पिंजरे का। घेरा ये जर ज़रा माया और आस्क्तियों का, जी हां ! लगता है जैसे मृत्यु ही है, मार्ग मात्र मुक्ति का। अंत नहीं मृत्यु जीवन का बस परिवर्तन की यह छाया ज्यों सूरज आज उगा, फिर अस्त हुआ, कल फिर से उग आया। कुरूप नहीं, दोषित नहीं, त्याज्य भी नही है ये मृत्यु, मात्र खेल है ये तो अनादि आत्मा के देह रूपांतरण का। विधाता खेल रहा जिससे ये खेल है ऐसे धागों का यह खेल है जन्म मृत्यु का। ये फेर है जन्म मृत्यु का।।