रश्मि शाह – नारी/महिला – साप्ताहिक प्रतियोगिता

मैं नारी हूं
प्रतिरूप हूं मैं सृष्टि का,
कण-कण मुझमें ही खिला।
मुझसे ही है चलाएमान,
इस चल-अचल का सिलसिला।
मैं दामिनी, मैं कामिनी,
मैं जग-जननी, मैं नाशिनी
पाप जब-जब भी बड़ा,
मैं काली, कात्यायनी।
मैं नारी हूं-
इस जग की चालायनी।।
मैं बिन्दु रुप समष्टि का,
मैं कण भर मात्र इस सृष्टि का,
पर अपनी व्यष्टि में समेटे
इस जग की मायावनी।
मैं नारी हूं
स्नेह सिंचित कामायनी।।
स्नेह कलश से मैं उड़ेलती
नवरस की गंगावली।।
मैं नारी हूं।।