राहुल और लालू की दोस्ती में दिखने लगे रंग

यही कोई 16 साल के लंबे इंतजार के बाद कांग्रेस बिहार से आखिरकार राज्यसभा में अपना एक सांसद भेजने में सफल हो गई. सवर्ण भूमिहार जाति से ताल्लुक रखने वाले अखिलेश सिंह बिहार से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद बने. अप्रैल में पार्टी ने एक ब्राह्मण प्रेमचंद्र मिश्र को विधान परिषद भी भेजा. सवर्णों को अचानक इतनी तरजीह देना क्या कांग्रेस के किसी नई और बड़ी राजनैतिक तरकीब का हिस्सा है?

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि इन निर्णयों का आकलन बहुत गंभीरता से और गहराई से किया जा रहा है. वे कहते हैं, ”अखिलेश और मिश्र दोनों इसलिए जीत पाए क्योंकि उन्हें लालू प्रसाद यादव के परामर्श पर राजद का समर्थन प्राप्त हो गया.” लेकिन प्रत्याशियों का चयन कोई आकस्मिक घटना नहीं है. लालू से मुस्लिम, यादव और ओबीसी वर्ग के एक बड़े वोट बैंक की ‘गारंटी’ मिलती देख कांग्रेस ने बिहार के सवर्ण वोटों को लुभाने पर ध्यान लगाया है जो प्रदेश में संख्या में बेशक बहुत ज्यादा तो नहीं हैं मगर काफी प्रभावशाली है.

पड़ोसी उत्तर प्रदेश से उलट बिहार की सिर्फ 11 से 12 प्रतिशत आबादी ही सवर्ण है लेकिन राजद, लोजपा, जद (यू), रालोसपा जैसी पार्टियों में निचली जातियों और ओबीसी वोट के बंट जाने के कारण सवर्ण वोट की अहमियत संख्या में ज्यादा न होने के बावजूद काफी बढ़ जाती है.

कभी कांग्रेस का वोटर रहा सवर्ण वर्ग 1990 के दशक के आखिर में भाजपा के साथ चला गया. राजद और जद (यू) ने उसे लुभाने की बहुत कोशिशें की फिर भी 2014 के लोकसभा चुनावों तक वह भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहा.

साल 2000 में राजद ने सवर्ण वर्ग के गरीबों के लिए पांच प्रतिशत आरक्षण का राग भी छेड़ा था और इस वर्ग को लुभाने के लिए नीतीश सरकार ने तो अगड़ी जाति आयोग तक का भी गठन किया फिर भी सवर्ण वोट टस से मस न हुआ और भाजपा के साथ बना रहा.

भाजपा के अगड़ी जाति के वोट बैंक में पहली बार 2015 के विधानसभा चुनावों में सेंध लगती दिखी, जब कांग्रेस ने राजद और जद (यू) के साथ गठबंधन में 27 सीटें जीत लीं.

भाजपा के अगड़ों के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए कांग्रेस को साझेदारी में ज्यादा सीटें देना, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की रणनीति थी. कांग्रेस ने 16 सवर्ण प्रत्याशी उतारे, जिसमें से 12 जीत गए.

अगड़ी जातियों में कांग्रेस के लिए फिर से बढ़ती स्वीकार्यता भाजपा के लिए एक बड़ा धक्का था. राजद के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अगड़ों ने 2015 में कांग्रेस के पक्ष में वोट किया जो दर्शाता है कि उनके मन में अब लालू के प्रति पहले जैसी नफरत की भावना नहीं है.

संख्या में ज्यादा न होने के बावजूद बिहार के सवर्ण तबके का राजनीति पर दबदबा रहा है, खासतौर से शहरी क्षेत्रों में. फिलहाल 40 में से 15 लोकसभा सांसद सवर्ण जातियों के हैं. 2015 में राज्य की कुल 243 विधानसभा सीटों में से 51 सीटों पर अगड़े वर्ग के प्रत्याशी जीते.

बिहार में यादव, मुस्लिम, सवर्ण गठजोड़ आज तक कभी नहीं बना है. यदि कोई गठबंधन ऐसा गठजोड़ कायम करने में कामयाब रहता है तो इस बात पर रत्ती पर शक नहीं कि उसके विरोधियों की हालत पतली हो जाएगी. पर ऐसा भी नहीं है कि भाजपा चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठी रह जाएगी और विरोधी उसके वोट बैंक में सेंधमारी कर लेंगे. भाजपा ने भी 2014 की अपनी प्रचंड जीत को दोहराने के लिए अपने सोशल इंजीनियरिंग को नए सिरे से गढऩा शुरू कर दिया है.