रोज़ डे – इन्दिरा कुमारी

गया दिन वो जो
तराना प्यार का गाती थी
खत संग फूल भेज
संवेदना जगाती थी।

था फूल रोज़ वो
जो दिल दो को जोड़ता
सेंट वेलेन्टाइन के
सपने संयोगता।

बदल गया टाइम अब
फास्ट हुई ज़िन्दगी
गंधहीन रंगहीन
न भावना न बंदगी।

यौवन का प्यार तरंग
दिशाहीन भटक गया
असीमित प्रेम जो
सीमित हो सिमट गया।

दिल विल नैन वैन
समय नहीं मिलाने का
इन्टरटेन प्यार व्यार
उद्देश्य मनबहलाने का।

रोज़ डे प्रपोज डे
टेडी डे चॉकलेट डे
हग संग किस करे
हैपी वेलेन्टाइन डे।

अब गिरती साख देख इसकी
रोज़ गंधहीन हुआ
संयम, विवेक, त्याग, बिना
किस संवेदनहीन हुआ।