लाॅकडाऊन के क्या नुकसान – सुनील शुक्ला

लाॅकडाऊन के क्या
नुकसान।

चीन के वुहान शहर में जन्मे कोरोना नामक एक अदृष्य विषाणु द्वारा दुनिया में फैली महामारी से , भारत भी अछूता नहीं रहा। तेजी से मनुष्यों में फैलने वाले इस विषैले संक्रमण का स्थायी उपचार, अभी तक किसी देश के पास नहीं ।

एक दूसरे के स्पर्श से फैलने वाली इस महामारी से बचने का उपाय सिर्फ एक दूसरे के संपर्क से दूर रहना है। अतः सरकार द्वारा निर्देश जारी किया गया, कि कोई अपने घर से बाहर न निकले ; इसके लिए संपूर्ण देश में लाॅकडाऊन यानी यातायात व
सार्वजनिक स्थलों को पूरी तरह बंद कर, तालाबंदी कर दी गई।

समस्या का प्राथमिक व तात्कालिक उपचार लाॅकडाउन ही था । लेकिन लाॅकडाउन समस्या का स्थायी समाधान तो नहीं है। जिस तरह किसी बीमारी की दवाई के साइड इफेक्ट्स होते हैं, ऐसे ही इस उपचार के भी साइड इफेक्ट होना तय है।

देश में संभवतः इतनी बड़ी महामारी और उससे जनजीवन व आर्थिक जगत् का संकट, पहली बार पैदा हुआ है। औद्योगिक और व्यवसाय से जुड़े संगठन फिक्की (फैडरेशन ऑफ इंडियन चेम्बर्स, ऑफ काॅमर्स एण्ड इंडस्ट्री ) के अनुमान के मुताबिक लाॅकडाऊन से प्रतिदिन भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग 40 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार विगत 21 दिनों के लाॅकडाऊन में भारत की अर्थव्यवस्था को लगभग 8.76 लाख करोड़ का नुकसान होने की संभावना व्यक्त की गई है। तथा उपरोक्त संगठन की अध्यक्ष संगीता रेड्डी के अनुसार वर्ष 2020 के अप्रैल-सितम्बर के बीच, कम से कम 4 करोड़ नौकरियों के जाने का खतरा है।

प्रधानमंत्री बार-बार कंपनियों से लोगों को बाहर न करने का आग्रह कर रहे हैं, लेकिन उसका कितना असर हुआ , यह लाॅकडाऊन के बाद से सड़कों पर निकलने और सैकड़ों कि.मी.पैदल चलकर गाँव वापिस जाने को मजबूर हुए मजदूरों की भीड़ से साफ हो गया है।

संपूर्ण देश के लाॅकडाऊन में जरूरी सेवाओं के अलावा सभी सेवाएँ बंद कर दी गईं हैं, कारोबार थम गया है, दुकानें बंद हैं, आवाजाही पर रोक है। पहले से मुश्किलें झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए करोना वायरस का हमला एक बड़ी मुसीबत लेकर आया है। पिछले वर्ष से ही ऑटो
मोबाइल सेक्टर, रियल स्टेट, लघु उद्योग समेत असंगठित क्षेत्र में सुस्ती छाई हुई थी। बैंक एन.पी.ए. की समस्या से अब तक जूझ रहे हैं। सरकार निवेश के जरिए नियमों में राहत और आर्थिक मदद देकर अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की कोशिश कर रही है।

नेशनल हाकर्स फेडरेशन के मुताबिक लाॅकडाऊन में देश भर के 4 करोड़ से अधिक रेहड़ी- पटरी, ठेले वालों, रिक्शा चालकों व गरीब मजदूरों में 95 प्रतिशत घर पर बैठे हैं, और लगभग 8 हजार करोड़ रुपये दैनिक का टर्न ओवर देने वाले भारतीय अर्थव्यवस्था के इस हिस्से की पूंजी तेजी से बिखर रही है। एवं इस सेक्टर से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े मजदूर बेहद दयनीय व बुरी स्थिति का सामना कर रहे हैं। इन्हें हुए नुकसान का आंकलन कैसे होगा।

पुनश्च- संभवतः कुछ दिनों या महीनों में इस महामारी से निजात मिल जाए और देश के अधिकांश लोगों का जीवन बचाने में हमारी सरकारें कामयाब भी हो जाये ; लेकिन लाॅकडाऊन के दौरान छोटे, मझोले उद्योगों व व्यापार तथा उनसे जुड़े श्रमिकों को हुई आर्थिक व सामाजिक क्षति का आंकलन और भरपाई कैसे संभव है ?

नाम- सुनील शुक्ला