शंकरदान चारण – जवान/फौजी/सैनिक – साप्ताहिक प्रतियोगिता

कैसे कह दूँ के माँ
तू अपने आसूँ पोछ ले
बिखरे पड़े हैं मेरे जिस्म के टुकड़े
उन्हे समेट अपने अँग मे भर ले तू माँ
कैसे कह दूँ के माँ तू वहीँ लोरी सुना
जिससे सुन के मैं चेन की नींद में सोता था माँ
लेले गोदी मे अपनी सर सहला देना माँ
मेरी शहादत का गम ना तू बना
तेरे बेटे बहुत हैं सरहद पर खडे
उन्हीं मे मुझे दूंढ लेना तू माँ
बिखरे पड़े हैं जिस्म के टुकड़े उन्हे समेट अपने अँग मे भर ले तू माँ
कैसे कह दूँ के माँ तू अपने आसूँ पोंछ ले।।