शंकर दान – नव वर्ष – साप्ताहिक प्रतियोगिता

सत्यार्थ रुप मे यही नववर्ष सबकी अपनी दृष्टि है होती सबकी अपनी दृष्टि है होती वर्ग धर्म का ना हो संघर्ष सत्यार्थ रूप में यही नववर्ष अपनेपन का एहसास करा दे भाइचारे का आभास करा दे जीवन मे भर दे उत्कर्ष सत्यार्थ रूप में यही नववर्ष देरो हरम के झगड़े मिटा दे ऊंच नीच को दूर भगा दे मानवता में नित हो हर्ष सत्यार्थ रूप में यही नववर्ष पुत्र पुत्री का भेद मिट जाए अबला जब सबला हो जाए युग शांति का जो लाए विमर्श सत्यार्थ रूप में यही नववर्ष आंचल ना जब खींचा जाए जिन्दा कोइ ना जलाया जाये विश्व बंधुता ही हो आदर्श सत्यार्थ रूप में यही नववर्ष नारी का शोषण जब ना हो. भ्रष्ट का पोषण जब ना हो राष्ट्र विरोधी का हो अपकर्ष सत्यार्थ रूप में यही नववर्ष स्नेह सुधा की नदियाँ प्रवाहित हों ऊर्जा से पृथ्वी उल्लासित सुखमय हो जब भारतवर्ष सत्यार्थ रूप में यही नववर्ष अल्लाह जब राम हो जाए. कृष्ण जब करीम बन जाए सब धर्मो का हो एक ही दर्श सत्यार्थ रूप में यही नववर्ष हाथ जोड़कर विनती हूं करता जो जैसा करता वैसा भरता मातृ वंदना ही हो निष्कर्ष