शशि कुशवाहा – नारी/महिला – साप्ताहिक प्रतियोगिता

जन्म तेरे धरा पर लेने पर,
घर में उदासी सी छा जाती है ।
माँ को छोड़ कर हर ओठो पर
क्यों मनहूसियत सी छाने लगती है?

बेफिक्री से चलने पर ,
घूर घूर के देखा जाता है ।
समाज ताने कसने को रहता तैयार,
ए औरत क्यों तुझपर बेशर्मी का तंज कसा जाता है?

अतीत की यादों से कभी जो,
मन ख़ुशी से जब नाच जाता है ।
दो पल की ख़ुशी में देख के तुझको,
ए औरत क्यों तुझपर बेपरवाह का ताना लग जाता है ?

प्रेम भरे हृदय से जब  ,
प्रिय को आलिंगन कर जाती हो ।
इजहार कर समर्पण कर देती हो ,
तो ए औरत क्यों निर्लज्ज तुझे समझा जाता है ?

कभी जो अपनी मर्जी से ,
सपने को पूरा करने आगे कदम बढ़ाती हो ।
स्वछंदता का आरोप लगा ,
क्यों ए औरत सारी गलतियाँ शीश तेरे मढ़ दी जाती है ?

घर बाहर दोनों करती है सामंजस्य ,
जिम्मेदारियों से कभी नही पीछे हटती हो।
ना रूकती , ना थकती और ना करती हो आराम ,
ऐ औरत फिर भी तुझको क्यों गैरो में तौला जाता है ?